जन क्रांतियों ने ट्यूनीशिया, मिस्त्र और लीबिया में तानाशाहों को चित कर दिया। अब मिस्त्र जैसे देशों में कट्टरपंथियों की जीत के रूप में इसके जो परिणाम सामने आ रहे हैं, वे थोड़ा असहज करने वाले हैं। ऎसे में बार-बार यह सवाल उठता है कि आखिर तानाशाहों का अंत करने के लिए जो जनक्रांति हुई थी, उसका मूल मकसद क्या था? तब क्रांति में दिखने वाले मौलिक तत्व लोकाधिकारों की प्रतिष्ठा के लिए प्रतिबद्ध थे या इस्लामी कट्टरपंथ की स्थापना के लिए? ट्यूनीशिया में लगभग ढाई से तीन दशक तक प्रतिबंधित रही "इस्लामी एन्नहदा पार्टी" द्वारा सबसे अधिक सीटें प्राप्त कर सरकार को नेतृत्व देने की हैसियत जुटा लेना और अब मिस्त्र की संसद में इस्लामी कट्टरपंथी दलों द्वारा दो-तिहाई सीटों पर कब्जा करना इस बात का संकेत मालूम पड़ता है कि अरब देशों में भड़की क्रांति की मूल प्रेरणा लोकाधिकार की प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि इस्लामी तंत्र की स्थापना थी।
बीते वर्ष नवम्बर में तहरीर चौक पर जब लोक प्राधिकारवादियों द्वारा दूसरी क्रांति का बिगुल बजाया गया, तो जिन इस्लामवादी पार्टियों ने उसका साथ नहीं दिया था, वही अब संसद पर कब्जा जमाने में सफल हो गई हैं। इस पूरे घटनाक्रम में एक बात यह देखी गई है कि इन दलों के प्रति सैन्य नेतृत्व में सॉफ्ट कार्नर दिखा। इन दोनों के एक दूसरे के प्रति सहयोगात्मक सम्बंध के कारण ही विरोध को दरकिनार करते हुए सैन्य नेतृत्व ने 508 सीटों वाले संसद के निचले सदन "पीपुल्स असेम्बली" की 498 सीटों के लिए लिए मतदान करा लिया।
उल्लेखनीय है कि शेष 10 सीटें राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत सदस्यों द्वारा भरे जाने के लिए आरक्षित हैं। सम्भवत: क्रांतिवादियों को इस बात का आभास था कि चुनाव परिणाम उदारवाद को हाशिए पर ला देंगे, इसलिए वे सैन्य नेतृत्व में सम्पन्न होने वाले चुनावों का विरोध कर रहे थे, लेकिन उनका विरोध सफल नहीं हो पाया। तीन चरणों में सम्पन्न हुए इन चुनावों के अंतिम नतीजे घोषित हो चुके हैं। जो परिणाम सामने आए हैं, वे सामान्य अनुमान की परिधि से बाहर नहीं हैं, लेकिन फिर भी वे चिंता पैदा करने वाले हैं।
इसका कारण है कि पिछले तीन दशक से प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड की राजनीतिक शाखा फ्रीडम एंड जस्टिस पार्टी के नेतृत्व में इस्लामी दलों द्वारा संसद की दो-तिहाई (235) सीटों पर कब्जा कर लिया जाना। इसके मुकाबले उदारवादी पार्टी अल वफ्द का संसद में प्रतिनिधित्व पूरी तरह से हाशिए पर चला गया। इन चुनाव परिणामों की घोषणाओं के एक दिन बाद ही मिस्त्र की पहली निर्वाचित संसद (हुस्नी मुबारक के पतन के बाद) के उद्घाटन सत्र में सांसदों ने हिस्सा लिया और मुस्लिम ब्रदरहुड के वरिष्ठ नेता सादाद अल-खतानी को 399 मतों से निचले सदन अध्यक्ष (स्पीकर) चुन लिया गया। सादाद अल-खतानी का स्पीकर के रूप में चुना जाना यह दिखाता है कि मिस्त्र की संसद भविष्य में इस्लामी कट्टरपंथी कानूनों की देश को ले जाने के मामले में एकजुट रहेगी।
यह प्रक्रिया पूर्ण हो जाने पर मिस्त्र का प्रशासन राहत की सांस ले सकता है, क्योंकि उसने चुनाव शांतिपूर्वक सम्पन्न करा लिए, लेकिन इस्लामी प्रभुत्व वाली संसद में कुछ नए सांसदों ने जिस तरह से शपथ ग्रहण करते समय निर्धारित प्रारूप बदलकर खुदा के कानून को स्थापित करने या क्रांति को जारी रखने के नाम पर शपथ ली, उससे यह नहीं लगता कि आने वाले समय में भी सब कुछ शांतिपूर्ण सम्पन्न होगा। सलफी अल-नूर मिस्त्र में सख्त इस्लामी कानूनों को स्थापित करने का पक्षधर है। उसका मानना है कि सातवीं सदी में हजरत मोहम्मद और उनके सहयोगियों के समय प्रचलित इस्लाम की तर्ज पर ही मिस्त्र को चलाया जाए। मुस्लिम ब्रदरहुड इसकी अपेक्षा कुछ मॉडरेट है।
इसलिए उसकी तरफ से यह घोषणा की जा रही है कि वह मिस्त्रवासियों पर अपने मत को बलपूर्वक थोपने के पक्ष में नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है वह मिस्त्र को उदार सेक्यूलर कानूनों के आधार पर चलाना चाहता है, बल्कि वह चाहता है मिस्त्रवासी इसे क्रमश: स्वीकार करें, ताकि व्यवस्था का रूपांतरण सम्भव हो सके। यदि सार्वजनिक तौर यह घोषणा की जाए कि संसद में कट्टरपंथ का जमावड़ा वास्तव में मिस्त्र के लोगों की इच्छा की वास्तविक अभिव्यक्ति है, तब क्या यह मानना उचित नहीं होगा कि आने वाले समय में जब नया संविधान बनेगा तो उसमें कुटिल चालों के जरिए धार्मिक कट्टरता को समाविष्ट किया जाएगा और इसके बाद में उसे भी जनता की वास्तविक इच्छा की अभिव्यक्ति बताकर इसी तरह से वैध बनाने की कोशिश की जाएगी।
यह मुस्लिम ब्रदरहुड वही संस्था है, जिसने तीस साल तक हुस्नी मुबारक के धर्मनिरपेक्ष राज का विरोध किया है और अपनी कट्टरपंथी नीति के कारण प्रतिबंधित रही। अब उदारवादी गठबंधन के हाशिए पर चले जाने से कट्टरपंथियों के लिए बिना किसी प्रतिरोध के खेल खेलने का मैदान उपलब्ध हो गया है, लेकिन वे जिस तरह के विचार दुनिया के सामने रख रहे हैं, क्या उससे यह नहीं लगता है कि वे मिस्त्र का तालिबानीकरण कर रहे हैं। अब देखना यह है कि जून में सम्भावित राष्ट्रपति चुनावों में मिस्त्र में इस इस्लामी कट्टरता का प्रभाव कितना और कैसा दिखता है।
फिलहाल इस समय राष्ट्रपति पद की दौड़ में प्रमुख चार प्रत्याशी ही मैदान में नजर आ रहे हैं-अम्र मोसा, हजेम सलह अबू इस्माइल, अब्देल मोनीम अबुल फुतूह और मोहम्मद सलीम अल-अवा है। राष्ट्रपति कोई बने इसकी सम्भावना कम है कि मिस्त्र उदारवादी लोकतंत्र पर आधारित रह पाएगा, क्योंकि राज्यतंत्र की प्रकृति भावी संविधान तय करेगा। सम्भावना है कि संविधान पर इस्लामी कट्टरपंथ का प्रभाव रहेगा।
डॉ. रहीस सिंह (लेखक विदेश मामलों के जानकार हैं)
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