गुलाबी सर्द, मखमल-सी मुलायम धूप... पेड़ों के ओट से छन-छनकर बिखर रही थी। फ्रंट लॉन खचाखच भर चुका था। सबको इंतजार था सिने जगत के चार सितारों जावेद अख्तर, गुलजार, विशाल भारद्वाज और प्रसून जोशी का...। एक घंटे का शो- कहानी किसको कहते हैं 15 मिनट देरी से शुरू हुआ, क्योंकि इस कहानी के सितारे जयपुर के ट्रैफिक में फंस गए थे। बिन नायिका की इस कहानी की शुरूआत कमजोर रही। सेशन में खरगोश और कछुआ के साथ ही दादी-नानी की कहानियों की भी बात हुई। गीतकार गुलजार ने कहा हमारी सोचने की प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि दिमागी तौर पर हम कितने सक्षम हैं। मेरे साथ यह प्रक्रिया तब शुरू होती है जब मैं नोटपैड लेकर बैठता हूं और कलम मेरे हाथ में होती है।
कहानी किसको कहते हैं, विष्ाय पर जावेद अख्तर ने कहा, मेरे खयाल से सबसे पहले यह देखा जाता है कि कहानी क्या है और उस कहानी का स्क्रीन प्ले कैसे किया जाएगा? हिंदी सिनेमा में जो कहानी लिखी जाती है, वह छोटी होती है, लेकिन उसकी लेंथ बहुत ज्यादा होती है। सिनेमा के लिए लिखी गई स्टोरी में लेखन के साथ ही डायरेक्शन और एडिटिंग की भूमिका भी खास होती है। कहानी में तीन मुख्य लाइन होती हैं। किसके बारे में है? क्या कहना चाहते हंै? उद्देश्य क्या है? हर हिंदी फिल्म की कहानी तीन शब्दों के साथ पिरोई जाती है। बिगनिंग, मिडिल और क्लाइमेक्स...। जावेद कहते हैं कि एक लड़का और लड़की घर से भागकर दिनभर प्लेटफॉर्म में बिताते हैं। शाम को दो ट्रेन आती है और अपनी-अपनी ट्रेन पकड़कर चले जाते हैं। मेरे खयाल से ये कहानी नहीं है और मुझे ऎसी कहानी नहीं भाती हैं। 1933 के पहले सिनेमा पर नजर डाले, तो एपिक बेस्ड था। मसलन रामलीला, कृष्णलीला, नौटंकी, उर्दू, फारसी, विक्टोरिया थिऎटर के साथ हिंदी सिनेमा का विकास हुआ। अब तो एपिक में भी बुहत कुछ बदल गया। ठीक उसी तरह सिनेमा में बदलाव आया है। एम्प्रेशन बदल गए हैं, हीरो बदल गए हैं। आज का दर्शक देवदास को हीरो नहीं मानता। इस सेशन में मौजूद फिल्मकार विशाल भारद्वाज ने कहा कि, मेरे लिए कहानी से ज्यादा महत्वपूर्ण क्लाइमेक्स होता है।
कहानी... का क्लाइमेक्स गुलजार बोले, हर कहानी का क्लाइमेक्स होता है और आज मैं इस कहानी का क्लाइमेक्स बनाने की कोशिश करता हूं। यह जावेद अख्तर की नई किताब का नाम है, जो उन्होंने सोमवार को लॉन्च भी की। किताब से जावेद ने कुछ नज्में सुनाई-मेरे मुखालिब ने चाल चल दी है और अब मेरी चाल के इंतजार में है... व किसी का गम सुनकर मेरी पलकों में जो आ गया है आंसू... शामिल हैं। लावा से पहले 1995 में जावेद ने तरकश नाम से बुक लिखी थी।
प्रशंसक हुए मायूस 5हर तरफ से बाउंसर्स का घेरा, ऑटोग्राफ लेने के लिए प्रशसंकों से किताब खरीदने की बात कहना और सीट पर बैठने के लिए इधर से उधर भटकना...जेएलएफ में सोमवार को शिरकत करने आए गीतकार जावेद अख्तर भी अभिनेता अनुपम खेर की राह पर चलते नजर आए। अपने पसंदीदा गीतकार का ऑटोग्राफ लेने के लिए प्रशंसक जैसे-तैसे करके जावेद अख्तर तक पहुंचने में कामयाब तो हो गए, लेकिन जावेद ने भी अपने प्रशंसकों को किताब खरीदने के बाद ऑटोग्राफ देने की बात कही। ऑटोग्राफ लेने वालों में अरूणा रॉय भी थीं, लेकिन जावेद ने उनकी ओर देखा भी नहीं। जावेद के प्रशंसकों को उनका रवैया अच्छा नहीं लगा। मेट्रो मिक्स की एक खास बातचीत में जावेद ने कहा कि साहित्योत्सव में प्रेमचंद, मिंटो आदि नामी लेखकों को नजरअंदाज नहीं किया जा रहा है।
दिल्ली, मुम्बई आदि शहरों में होने वाले साहित्योत्सव में इन लेखकों की जीवनी के साथ उनसे जुड़ी घटनाओं पर चर्चा की जाती है। फिल्मों की कहानी में आए बदलाव को लेकर पूछे गए प्रश्न के जवाब ने जावेद ने कहा कि समय के अनुसार परिवर्तन होता है। कई बार प्रोड्यूसर की मांग पर कहानी लिखी जाती है, कभी विष्ाय को ध्यान में रखकर कहानी का ताना-बाना बुना जाता है। आइटम नम्बर्स को कहानी का एक हिस्सा बनाना, इसी कड़ी का भाग है। आइटम नम्बर्स दर्शकों को पसंद आ रहे हैं। ऎसे में प्रोड्यूसर या डायरेक्टर को और क्या चाहिए। ऎसा बिल्कुल नहीं है कि स्टार कास्ट से ही फिल्में हिट या फ्लॉप होती है। यदि कहानी में दम है, तो मजबूत स्टार कास्ट हो या नहीं, उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है। सलमान रश्दी के मामले पर जावेद ने कहा कि रश्दी अगर एक जुमला कह देंगे, तो यह मामला और बढ़ जाएगा। उन्हें जेएलएफ से दूर ही रहना चाहिए।
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