जयपुर। "गुरू गोविंद दोउ खड़े काकौ लागे पांव, बलिहारी गुरू आपने गोविंद दियो बताय।" गुरूके प्रति इतनी श्रद्धा अब शायद किताबों और कहानियों में ही पढ़ने को मिले। लेकिन अभी भी कुछ ऎसे क्षेत्र बाकी हैं, जिनमें गुरू के प्रति मन में बसी श्रद्धा पर नतमस्तक हो जाने को जी चाहता है। यह है कला का क्षेत्र, जिसमें रंगमंच, नृत्य, संगीत और पेंटिंग हर तरह की कला शामिल है। इन क्षेत्रों में आज भी शिष्य बनाने से पहले गुरू पूजा का विधान है। इतना ही नहीं पुरानी गुरू शिष्य परंपरा की तरह आज भी गुरू दक्षिणा का विधान है। आधी शताब्दी बीत जाने के बाद भी इस क्षेत्र में कलाकारों के मन में अपने गुरू की यादें बसी हुई है।
17 साल से गुरू की सेवा में वरिष्ठ कलाकार गोपाल स्वामी खेतांची अपनी पेंटिंग्स और आर्ट एग्जिबिशन के लिए देश-विदेश में बिजी हैं। वे बताते हैं कि करीबन 34 साल पहले मेरी मुलाकात पेंटर माणक जोशी से हुई। उन्होंने मुझे पेंटिंग करते देखा। मेरी रूचि देखकर उन्होंने मुझे सिखाने का फैसला किया। उनका कहना था कि मेरी तरफ से उनके लिए गुरू दक्षिणा यही होगी कि मैं इस कला को आगे ले जाऊं। मेरा मानना है कि गुरू और शिष्य के मन में एक-दूसरे के लिए जो भावनात्मक जुड़ाव होता है, वहीं उन्हें प्रेम और आदर की प्रेरणा देता है। मेरा एक स्टूडेंट है लक्ष्य, जिसमें मैं वही भाव देखता हूं। वह 12 साल से मेरे साथ है। वो मेरी इज्जत तहेदिल से करता है और यह भावना दिखाने की जरूरत नहीं होती। ये किसी भी गुरू को अपने शिष्य की आंखों में दिख जाती है। अपना शिष्य चुनने से पहले मैं यही चीज हर एक में देखता हूं।
निखारते हैं कला वरिष्ठ रंगमंच आर्टिस्ट सरताज नारायण माथुर बताते हैं, रंगमंच के क्षेत्र में कला ईश्वर प्रदत्त होती है। गुरू उस कला को निखारने का काम करता है। 1948 में अजमेर में मेरी गुरू से मुलाकात हुई थी, जब मैं गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ा करता था। तब डीपी जोशी ने वहां पहला नाटक "रक्षाबंधन" में अभिनय कराया था। उस समय गुरू के प्रति शिष्यों के मन में श्रद्धा का सागर उमड़ता था। किसी व्यक्ति ने कुछ भी सीखा दिया तो उसे गुरू की तरह आदर दिया जाता था। डीपी जोशी के अलावा मैंने एमएन सोरल जी को भी अपना गुरू माना। उन्होंने मुझे कुछ ऎसी बातें बताई थीं, जिन पर मैं ताउम्र चला। राजस्थान यूनिवर्सिटी की ड्रामा डिपार्टमेंट की हैड अर्चना श्रीवास्तव मेरी शिष्या हैं। एक अच्छे शिष्य होने के सभी गुण उनमें मैं देखता हूं। कोई मुझसे थिएटर सीखना चाहता है तो मैं उसमें यही बात देखना चाहता हूं कि उसमें सीखने की ललक और समर्पण की भावना होनी चाहिए।
शिक्षा से पहले गुरू पूजा वरिष्ठ कथक नृत्यांगना उषा श्री बताती हैं, यह सही है कि अब भी गुरू-शिष्य परंपरा कला के क्षेत्र में है। हमने जब कथक सीखना शुरू किया था, तब भी शिक्षा शुरू करने से पहले गुरू पूजा करते थे और गुरू हमारे गंडा बांधते थे। अब भी वही होता है। तकरीबन 25 साल पहले जब मैं महाराजा स्कूल में पढ़ा करती थी, तभी मैं अपने गुरूसे मिली थी। वे कथक के प्रख्यात गुरू सिद्धहस्त बालमोहन जी शाह थे। इसके अलावा मैंने कथक गुरूश्रीधर जी सिद्ध से भी नृत्य सीखा। शिष्य में हर गुरू सीखने की ललक देखना चाहता है। इसके अलावा गुरू की शिक्षा-दीक्षा शिष्य आगे तक ले जाएं, यही उसकी अभिलाषा होती है। मेरा शिष्य राज भी ऎसे ही शिष्यों की श्रेणी में आता है।
लगन चाहिए स्कल्पचर आर्टिस्ट अर्जुन प्रजापति बताते हैं, मैंने जीवन में तीन लोगों को अपना गुरू माना है, जिनमें द्वारका प्रसाद शर्मा, महेंद्र दास और आनंदी लाल जी वर्मा हैं। पहले गुरू आनंदी लाल जी वर्मा थे, जिनसे मैं चौदह साल की उम्र में मिला था। उन्होंने सबसे पहले मुझसे मिट्टी से मूर्तियां बनवाई थीं। उस दिन मैंने गुरू पूजा भी की थी। मैं आज जहां भी हूं, मेरे तीनों गुरू की वजह से हूं। मेरे प्रिय शिष्यों में मेरा बेटा सुनील प्रजापति, किरण जांगिड़ और लक्ष्मीकांत शर्मा हैं। इन तीनों में ही गुरू को सम्मान देने की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। किसी भी कला की शिक्षा-दीक्षा लेने के लिए गुरू के प्रति श्रद्धा और उस कला को सीखने की लगन होना जरूरी है। मैं शिष्य चुनने में यही चीज देखता हूं।
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