भारत मिश्रित अर्थव्यवस्था के लिए विश्व में जाना जाता है। पिछले दो दशक से आर्थिक सुधार, खुली वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा भूमंडलीकरण के नाम पर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का वर्चस्व स्थापित होने लगा है। इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। अनुचित तरीकों से लूट की छूट और छल-कपट को पूंजीवादी व्यवस्था की विकृतियों की देन ही माना जाता है। अब भारत में भी लूट और छूट का खुला खेल होने लगा है, जो हमारी अर्थव्यवस्था और शासन व्यवस्था के लिए एक गंभीर चुनौती है। उपभोक्ताओं को ठगने की घटनाएं भी गत एक दशक में बढ़ी है। हमें पूंजीवाद के खतरों को समझना होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूंजीवादी को एक सीमित दायरे तक ही बढ़ावा दिया जाना चाहिए। - यशपाल यश, मानसरोवर, जयपुर
चमका जयपुर हाल ही में जयपुर में प्रवासी भारतीयों का सम्मेलन संपन्न हुआ। सम्मेलन से पूर्व जयपुर शहर को करोड़ों रूपए खर्च करके चमकाया गया। हवाई अड्डा क्षेत्र से कई ठेले वालों को हटाया गया। पुलों पर रंगीन रोशनियां लगाई गई। दीवारों की पेंटिग की गई। सड़कों की सफाई की गई। यह सब सम्मेलन तक ही रहा। अब तो वही पुराना हाल है। चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात। अब तो यत्र-तत्र गंदगी के ढेर नजर आ रहे हैं। कोई ध्यान देने वाला नहीं है। - राजेंद्र गुप्ता छिन्दी, सांगानेर, जयपुर
समाधान नहीं आत्महत्या आत्महत्या की घटनाओं में बढ़ोतरी चिंता की बात है। असल में जो व्यक्ति आत्महत्या करता है, वह चारों तरफ से निराश हो चुका होता है। उसे लगता है कि समस्या का अब कोई समाधान नहीं है। इसलिए मरने के अलावा कोई चारा नहीं है। संसार में ऎसी कोई समस्या नहीं है, जिसका समाधान संभव नहीं है। यदि ठोस प्रयास किए जाएं तो कोई न कोई राह निकल ही आती है। खुद ही घुटने के बजाय अपनी परेशानी अपने मित्रों या परिवारजनों को बतानी चाहिए। उनसे विचार-विमर्श के बाद कोई न कोई मार्ग अवश्य मिल जाएगा। - रामचंद्र शर्मा, किशनपोल, जयपुर
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