जिस देश में ऎसे लोग रह रहे हों, जो बमुश्किल अपना पेट भर पा रहे हैं, वहां राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन होना कितना सही है? मेजबानी करने के लिए हम तैयार हो गए, लेकिन हमने यह नहीं देखा कि इसके लिए जितने करोड़ खर्च होंगे, वह खर्चा उठाने का माद्दा हममें है भी या नहीं। दूसरा इन खेलों के होने से पहले ही हमारी दुनिया में कम फजीहत नहीं हुई है। भ्रष्टाचार के कारण तैयारियां अभी तक आधी-अधूरी हैं। खेल से जुड़े लोग आपस में तू तू-मैं मैं में लगे हुए हैं। बात अगर इस दृष्टिकोण से की जाए कि इन खेलों से हमें लाभ भी होगा, तो उससे आम आदमी को तो कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। दुनिया भर से आने वाले खिलाडियों के करतब देखने के लिए स्टेडियम में जो भीड़ जमा होगी और जो पर्यटक आएंगे, उनसे पैसा जरूर आएगा, लेकिन उसका लाभ देशवासियों तक पहुंचेगा, यह कहना मुश्किल है। चंद लोगों की जेबें जरूर भर जाएंगी। इसलिए हमें राष्ट्रमंडल खेलों की मेजबानी करनी ही नहीं चाहिए थी। हमें अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। दूसरा पहलू यह कि अब जब खेलों का आयोजन दिल्ली में होना ही है, तो सबकी यह कोशिश होनी चाहिए कि इनका आयोजन सफल हो, ताकि देश की नाक दुनिया के सामने कटने से बच जाए। - विनय मंडावत, चंदबाजी जनता की जिम्मेदारी शहर में जगह-जगह कॉलोनियों व सड़कों के किनारे और नगर निगम द्वारा रखे गए कचरा पात्रों के आस-पास से नगर निगम कर्मचारी जब कचरा उठाते हैं, तो इस बात पर शर्मिदगी होती है कि हम कितने असंवेदनशील और गैर-जिम्मेदार हैं। जो जगह कचरा फेंकने नहीं है, वहां हम पता नहीं क्या सोचकर कचरा फेंक देते हैं। अपना घर साफ करने के बाद कचरा कहीं पर भी फेंक देने से यह तो साफतौर पर कहा जा सकता है कि जनता अपनी जिम्मेदारी न तो समझती है और न समझना चाहती है। कोई भी समस्या होती है, सरकार और प्रशासन के सिर पर ठीकरा फोड़ने लगते हैं, लेकिन यह नहीं देखते कि हम खुद कितने जिम्मेदार हैं अपने समाज, राज्य और राष्ट्र के लिए? - नीति दुबे, विद्याधर नगर
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