वर्तमान में लोकतंत्र बाहुबलियों और परिवारवाद पर निर्भर हो गया है। इनका ग्राफ बढ़ता जा रहा है। आम आदमी डरा-सहमा लोकतंत्र के इस बिगड़ते स्वरूप को देख रहा है। राजनीति एकता, भाईचारे और विकास से परे है। आज के ज्यादातर नेता अपने आपको अलग दिखाने के लिए जातिवाद, क्षेत्रवाद, आरक्षण आदि का सहारा लेकर अपनी राजनीति की दुकान को चालू रखना चाहते हंै। जातिवाद, अलगाववाद, भ्रष्टाचार और घोटालों का राजनीति में बोलबाला है। इसके लिए सभी राजनीतिक पार्टियां दोषी हैं। सभी अपने स्वार्थो के हिसाब से काम कर रही हैं। उनके लिए चुनाव जीतना ही सब कुछ रह गया है। ऎसे में हाशिये पर खड़ा आम आदमी उस दिन का इंतजार कर रहा है, जब ऎसी राजनीति का अंत होगा। देश एक बार फिर से उठ खड़ा होगा, लेकिन इसकी शुरूआत उसे ही करनी होगी। - बाबूलाल कांकरेलिया, भानपुर कलां
असंवेदनशील जनता हम अपने समाज और देश के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। कितना गलत है जब हम अपने सार्वजनिक पार्को, सड़कों और पर्यटन स्थलों को गंदा करते हैं। जगह-जगह कचरा पात्र लगे होने के बावजूद ज्यादातर लोग इधर-उधर कचरा फेंक देते हैं। कहीं पर भी थूंक देते हैं। ऎतिहासिक इमारतों पर लिखकर उन्हें खराब कर देते हैं। झीलों और नदियों में कचरा फेंक देते हैं। जिन जगहों पर अपना मनोरंजन करने लोग जाते हैं, क्या उन्हें साफ और सुरक्षित रखना उनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं है। सरकार पर दोष मढने में कोई पीछे नहीं रहता, लेकिन दोष लगाने वाले खुद क्या करते हैं, इस पर वे ध्यान नहीं देते। प्रशासन के साथ आमजन का सहयोग अपेक्षित है। - अंकुर, प्रताप नगर
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