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Thursday, 09 February, 2012
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न्यायपालिका से आस
Friday, September 03, 2010, 09:19 hrs IST
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रूचिका छेड़छाड़ मामले में दोषी राठौड़ की याचिका को खारिज कर कोर्ट ने सराहनीय काम किया है। अगर राठौड़ को छोड़ दिया जाता, तो लोगों का इंसाफ पर से ही भरोसा उठ जाता। अगर न्याय से भी आम आदमी का भरोसा उठ जाए, तो देश के हालात और बदतर होते देर नहीं लगेगी। भोपाल गैस कांड को फिर से खोलना भी न्यायालय का सही कदम है। न्यायपालिका की सक्रियता के कारण ही देश के बिगड़ते हालात काबू में हैं। वरना विधायिका और कार्यपालिका के हालात तो किसी से छिपे नहीं हैं। आज देश चौतरफा समस्याओं से घिरा है, वहां नेताओं को अपने वेतन-भत्ते बढ़वाने की पड़ी है। संसद की देशवासियों के प्रति कोई जवाबदेही तय नहीं है। चर्चा और बहस होती है और नतीजा वही ढाक के तीन पात रहता है। ऎसे में न्यायपालिका से ही लोगों को आस है।
- रविकांत बैरवा, हीरापुरा
नि:शुल्क शिक्षा
केंद्र ने देश में 6 से 14 आयु वर्ग के बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा पाने का अधिकार तो दे दिया, लेकिन इसमें कई खामियां हैं। सबसे पहली बात तो यह कि 14 के बाद वे कहां से और कैसे शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे। उनमें से कई छात्र ऎसे होंगे, जो किसी भी कारण से आगे अपनी पढ़ाई जारी रखने में सक्षम नहीं होंगे, तो फिर उनका भविष्य क्या होगा। यहां तक जो पढ़ाई की है, उसका क्या मतलब रह जाएगा। दूसरी बात यह कि आजकल तो बच्चे तीन साल के बाद से ही स्कूल जाने लगते हैं। अब इस अधिकार में उन्हें शामिल न करने का क्या अर्थ है। उनके लिए अलग से कोई व्यवस्था क्यों नहीं है।
- शशि शर्मा, सीतापुरा
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