विविधताओं से भरे हमारे देश में मौसम भी एक-सा कहां रहता है। तीखी धूप का स्वाद हम चखते हैं तो बारिश में भीगते भी हैं। ठिठुरते दिनों में सूरज का इंतजार करते हैं तो तपते जेठ के बाद बूंदों की बाट जोहते हैं। इन मौसमों में एक मौसम ऎसा भी है जिसके लिए हम चाहते हैं कि यह बीते ही ना। वसंत का जादू हमें ऎसे अपनी गिरफ्त में ले लेता है कि इससे छूटने का मन ही नहीं होता। उत्तर भारत व समीपवर्ती देशों की छह ऋतुओं में से एक है वसंत। माघ महीने की शुक्ल पंचमी से वसंत ऋतु का आरंभ होता है। फाल्गुन और चैत्र मास वसंत ऋतु के माने गए हैं। फाल्गुन वर्ष का अंतिम मास है और चैत्र पहला। इस प्रकार हिंदू पंचांग के वर्ष का अंत और प्रारंभ वसंत में ही होता है। कड़कड़ाती ठंड के अंतिम पड़ाव के रूप में वसंत आता है और कुदरत को वासंती रंगों की सौगात देता है। पलाश के फूल, आम के पेड़ों पर आए बौर, हरियाली से ढकी धरती, कोयल की कूक और गुलाबी ठंड। मन को भाने वाले इस मौसम का हमारे शास्त्रों में खास महत्व है।
प्यार और विवाह का दिन वसंत पंचमी का हमारे शास्त्र में बहुत महत्व है। वैसे तो पूरा वसंत माह ही मायने रखता है। इसे शास्त्रों में भी प्रेम ऋतु माना गया है। वसंत पंचमी के दिन अबूझ मुहूर्त होने के कारण कई सावे रहते हैं। इस दिन विवाह के लिए पंडितों से मुहूर्त निकलवाने की जरूरत नहीं पड़ती। वसंत पंचमी के दिन ऎसे विवाह भी होते हैं, जिनकी शादी में ग्रहों की चाल की वजह से कुछ अड़चनें होती हैं। दाम्पत्य जीवन में सुख की कामना लिए विवाहित लोग कामदेव और रति की पूजा भी करते हैं।
वसंत को कामदेव का मित्र कहा गया है, इसलिए कामदेव का धनुष फूलों का बना हुआ माना गया है। इसकी कमान में आवाज नहीं होती। कामदेव का एक नाम अनंग है यानी बिना शरीर के यह प्राणियों में बसते हैं। कामदेव को मारक भी कहा जाता है, क्योंकि इनके बाणों का कोई कवच नहीं। कामदेव के बाण इस मौसम में सारी कायनात पर चलते हैं और सारी प्रकृति प्रेम में डूबी नजर आती है और यह वासंती ऋतु प्रेम ऋतु बन जाती है। वह कामदेव के ही तीर हैं, जो दिल के पार उतरते हैं और वैलेंटाइन्स डे कार्ड पर छपे होते हैं। पाश्चात्य संस्कृति से हमने यह एक दिन उधार लिया है और हमारी संस्कृति हमें वसंत के पूरे दो महीने देती है प्रेम रंग में रंगने के लिए।
पूजा, ज्ञान और भक्ति ज्ञानअर्जन के लिए इस दिन के खास मायने हैं। मां सरस्वती की पूजा के बाद ही विद्यारंभ किए जाने की परंपरा रही है। पौराणिक कथा अनुसार मां सरस्वती की पूजा सबसे पहले श्रीकृष्ण और ब्रह्माजी ने की। सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने वरदान दिया कि विद्या की इच्छा रखनेवाले माघ मास की शुक्ल पंचमी को पूजन करेंगे तो उनका मनोरथ पूरा होगा। गीता में भगवान् कृष्ण ने स्वयं को ऋतुओं में वसंत कहा है। जिसका अर्थ है वसंत की तरह उल्लास से भरे रहना। यह माना जाता है की वसंत ऋतु के रूप में भगवान कृष्ण प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होते हैं। इसी कारण ब्रज में वसंत के दिन से ही होली का उत्सव शुरू हो जाता है और राधा-गोविंद का उत्सव मनाया जाता है। वसंत के दिनों में गुरूद्वारों में राग वसंत में गुरूवाणी का मनोहारी कीर्तन होता है। गुरूग्रंथ साहिब की वाणी में जो 31 शास्त्रीय राग इस्तेमाल हुए हैं, उनमें एक वसंत राग भी है। फाग गायन भी इसी ऋतु में शुरू हो जाता है।
सृजन का समय हर नई शुरूआत, नए सृजन का समय है वसंत ऋतु। यह विशेष दिन गृह प्रवेश, नव व्यवसाय, शिक्षा की शुरूआत या किसी भी नए सृजनात्मक कार्य के लिए शुभ माना गया है। वसंत में मौसम की अनुकूल परिस्थितियों के चलते किसी भी काम करने के लिए अच्छे अवसर बनते हैं। इसी वजह से इसे नव सृजन की ऋतु माना गया है। इस मौसम में रंग-बिरंगे फूल खिलने लगते हैं। यह हमें संदेशा देते हैं कि फूलों की तरह खुशियां और मुस्कराहट फैलाते रहो। वसंत में पीले रंग का बहुत महत्व है। यह रंग जीवन में त्याग और विजय का रंग है यानी अपने विकारों का त्याग कर अपनी कमजोरियों पर विजय पाएं। यह श्ृंगार की ऋतु है, जो हमें व्यवस्थित और सजे-धजे रहने की सीख देती है। धरा भी इस मौसम में सोलह सिंगार करती हैं। हम इसके सिंगार पर मुग्ध होते हैं, पर अब समय है कि हमें धरा की खूबसूरती को बचाए रखना है। पर्यावरण में बढ़ता प्रदूष्ाण, ग्लोबल वार्मिग से बिगड़ता सिस्टम यदि हमने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया तो वह दिन दूर नहीं जब प्रकृति का सौंदर्य केवल किताबो में ही रह जाएगा। प्रकृति की सेवा तन-मन-धन से करना और उसके जीवन के हर रूप को बनाए रखना ही वसंत-पंचमी की सच्ची पूजा है। अंशु हर्ष व सौम्या
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