इस पर्व की शुरूआत के बारे में निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, लेकिन कुछ पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं जो इसके प्रारंभ होने की कथा कहती हैं। पुराणों के अनुसार देव-दानव युद्ध में जब दानव हावी हो रहे थे तब इन्द्र को विचलित देख इंद्राणी ने रेशम के धागे को मंत्रों से पवित्रकर पति की कलाई पर बांध दिया। वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। इंद्र विजयी हुए और रक्षासूत्र बांधने की प्रथा चल निकली। इसे सिर्फ भाई-बहन का पर्व ही नहीं माना जाता। गुरूदेव रविंद्रनाथ टैगोर के समय में 1905 में शांतिनिकेतन में श्रावणी पूर्णिमा पर मित्रों को रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा कायम हुई जो आज तक चली आ रही है। वहां इसे दोस्तों के बीच मधुर संबंध स्थापित करने वाले पर्व के रूप में मनाया जाता है। एक अन्य पौराणिक कथानुसार जब श्रीकृष्ण ने शीशुपाल का वध अपने चक्र से किया था और जब चक्र वापस उनके पास आया तो श्रीकृष्ण की अंगुली कट गई और खून बहने लगा। यह देख द्रौपदी ने अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर कृष्ण की अंगुली में बांधा। तब कृष्ण ने उनकी रक्षा का वचन दिया था और द्रौपदी-चीर हरण के समय अपने उसी वचन का पालन किया। तब से रक्षा बंधन का पर्व चला आ रहा है। राखी से जुड़े ऎतिहासिक प्रसंग भी हैं। मेवाड़ की महारानी कर्मावती को जब बहादुरशाह द्वारा अपने राज्य पर आक्रमण किए जाने की पूर्व सूचना मिली तो उन्होंने सहायतार्थ मुगल शासक हुमायूं को राखी भेजी। हुमायूं ने रक्षासूत्र की लाज रखी और महारानी और उनके राज्य की रक्षा की। रक्षा सूत्र एक रूप अनेक रक्षा सूत्र भारतीय संस्कृति की विविधता को एकता के एक धागे में पिरोता है। भारत की अलग-अलग संस्कृतियों और राज्यों में इसे अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है। श्रावण यानी सावन के महीने में आने से इसे सलूनो या श्रावणी भी कहा जाता है। उत्तरांचल में इसे श्रावणी कहते हैं। इस दिन यजुर्वेदी द्विजों का उपकर्म होता है। उत्सर्जन, स्नान-विधि, ऋषि तर्पणादि करके नवीन यज्ञोपवीत धारण किए जाते हैं, और ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है इसलिए इसे ब्राह्मणों का सर्वोपरि त्योहार माना जाता है। अमरनाथ यात्रा में यह दिन खास महत्व का माना गया है। गुरूपूर्णिमा से शुरू होने वाली अमरनाथ यात्रा रक्षा बंधन के दिन श्रावणी पूर्णिमा को संपूर्ण होती है। माना जाता है कि इसी दिन यहां का हिमानी शिवलिंग भी पूरा होता है। इस दिन गुफा में मेला भी लगता है। महाराष्ट्र में यह त्योहार नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से विख्यात है। इस दिन लोग नदी या समुद्र के तट पर जाकर जनेऊ बदलते हैं और समुद्र की पूजा करते हैं। समुद्र के स्वामी वरूण देवता को प्रसन्न करने के लिए नारियल अर्पित किए जाते हैं। मुंबई का तट इन दिनों नारियल के फलों से भर जाता है। राजस्थान में रामराखी और चूड़ाराखी बांधने की भी परंपरा है। इसमें लाल-हरे डोरे पर पीले छींटों वाला फुंदना लगा होता है और इसे भगवान को बांधा जाता है। चूड़ा राखी भाभियों को बांधी जाती है। जोधपुर में इस दिन पkसर और मिनकागाड़ी पर गोबर, भस्म और मिट्टी आदि से शरीर को शुद्ध करके तर्पण करने की भी परंपरा है। यज्ञ भी किए जाते हैं। दक्षिण भारत में इस पर्व को अवनि अवित्तम कहते हैं। यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मणों के लिए यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन नदी या समुद्र के तट पर स्नान करने के बाद ऋषियों का तर्पण कर नया यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। नव जीवन की प्रतिज्ञा ली जाती है। इस पर्व का एक नाम उपक्रमण भी होता है जिसका अर्थ है नई शुरूआत। ब्रज में हरियाली तीज से श्रावणी पूर्णिमा तक समस्त मंदिरों एवं घरों में ठाकुर झूले में विराजमान होते हैं। रक्षाबंधन के दिन झूलन दर्शन समाप्त होते हैं। लाल-पीले धागे का दार्शनिक-आध्यात्मिक पहलू राखी यानी सूत्र, एक धागा जो खास लाल-पीले रंग का होता है। इस सूत्र के साथ ही इसके रंगों का भी खास महत्व है। राखी का पीला डोरा सतोगुण का प्रतीक और ज्ञान का सूचक है। प्राचीनकाल में संन्यासी पीले-गेरूआ वस्त्र धारण किया करते थे। ज्ञान का एक रूप प्रकाश भी है और पीला होता है। पीला रंग त्याग और बलिदान का भी है। रक्षाबंधन के दिन बहन भाई की कलाई में पीला धागा बांधकर कामना करती है कि उसका भाई ज्ञानवान हो। ज्ञान के प्रतीक इस पीली राखी में लाल और हरे रंग की रूई भी होती है जो संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती है। लाल रंग प्रसन्नता और प्यार का व हरा रंग समृद्धि का प्रतीक है। रोली का लाल तिलक भी भाई की प्रसन्नता की कामना का सूचक है। अब राखियां कई नए डिजाइन्स में आ रही हैं, लेकिन आज भी लाल, पीला और हरा रंग इनमें जरूर होता है। इन तीन रंगों से बनी राखी ज्ञान, प्रसन्नता और समृद्धि की त्रिवेणी है। आज भी नहीं टूटी "आन" यहां एक शहर ऎसा भी है जहां इस पवित्र दिन हर भाई की कलाई सूनी रहेगी। गाजियाबाद में रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाया जाता। पिछले करीब एक हजार साल से यहां रक्षासूत्र नहीं बांधा गया। करीब एक हजार साल पहले मोहम्मद गौरी ने इस गांव के सभी लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। उस दिन रक्षाबंधन का दिन था। बस तभी से यहां यह "आन" पड़ गई और फिर कभी यहां रक्षाबंधन नहीं मनाया गया। गांव में अंधविश्वास है कि अगर गांव का कोई परिवार सैकड़ों सालों से चली आ रही इस रीत को तोड़ने की कोशिश करता है तो उसे जानलेवा बीमारी हो जाती है। गांव की लड़कियां अपने भाई को राखी बांधना चाहती हैं, लेकिन यह डर इन्हें रोकता है।
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