अच्छी इंटीरियर डिजाइनर फर्म का सफलतापूर्वक संचालन कर रही हैं रीना कपूर। पेरेंट्स जब-तब गैरवाजिब मांगे रखते रहते हैं जिन्हें वह पूरा नहीं कर पाती। पिता कभी भी कोई काम सौंप देते हैं ताकि बेटे को तकलीफ न हो। एक बार रीना की बेटी बीमार थी और काम भी बहुत ज्यादा। उसने मां को स्थिति बताते हुए विनम्रता से इनकार कर दिया। मां ने पापा तक वह खबर मिर्च मसाला लगाकर पहुंचाई कि अब हम उसके लिए बोझ बन गए हैं। थोड़ा कमाने क्या लगी है खुद को ज्यादा ही समझने लगी है और भी न जाने क्या-क्या। रीमा को पता चला तो शॉक्ड रह गई। दोबारा ऎसा न होने पाए इसके लिए उसने पेरेंट्स और खुद के बीच एक सीमा तय कर दी। पिता के बिजनस में हाथ बंटाता है करण। पिता की पसंद की लड़की से शादी की, फिर जब उसका अपना परिवार शुरू हुआ तो उसे अपनी पत्नी और बच्चों की जरूरतों को पूरा करने और पिता की बातों और मांगों के बीच संतुलन बनाने में दिक्कत होने लगी। पिता ने नाराज हो प्रॉपर्टी और सारे नॉमिनेशन्स से उसे बेदखल कर दिया। यह धक्का उसके लिए बड़ा था। और तो और पिता ने अपने सीनियर सिटीजन्स गु्रप में भी उसे बदनाम करना शुरू कर दिया कि वह उन्हें टॉर्चर करता है। पिता के साथ काम करने की वजह से वह अपने लिए कुछ भी नहीं बचा पाया और डिप्रेशन में आ गया। अंतत: उसके पास कोर्ट में जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा। दोनों के रिश्ते हमेशा के लिए खराब हो गए। घर वह जगह है जहां पेरेंट्स के साए में आप खुद को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। माता-पिता का प्यार, उनकी स्वीकार्यता, सुरक्षा-संरक्षा और पोषण यह सब है यहां। तो यह यकीन कैसे करें कि वे ही अब हमारे सबसे बड़े दुश्मन हो गए हैं। लेकिन ऎसा भी होता है। कभी-कभी यह स्वर्ग भी असुरक्षित हो सकता है। प्यार की जरूरत माता-पिता और बच्चों का सुंदर रिश्ता बच्चों के पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। यह प्यारा रिश्ता हमें आत्मविश्वास देता है और एक जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा भी। लेकिन इस रिश्ते में कहीं दरार हमें डिस्टर्ब, परेशान और असंतुष्ट बना देती है। यह बच्चों की मानसिक स्थिति पर असर डालती है और वे रिश्तों के प्रति निष्ठा जैसी भावनाओं से दूर हो सकते हैं। आस-पास बहुत लोग मिल जाएंगे जो अयोग्य हैं और आत्मविश्वास से अधूरे। कारण की तह में जाएं तो पाएंगे कि बचपन में ये उपेक्षा, उपहास, पिटाई, शोषण, आलोचना और नकारे जाने के दौर से गुजर चुके हैं। ऎसे बच्चे अनजाने ही मान बैठते हैं कि वे अच्छे बच्चे नहीं हैं और पूरी उम्र उन पर यह अहसास हावी रहता है। पेरेंट्स क्यों दुश्मन हो जाते हैं इसकी तुच्छ सी वजहें हैं लेकिन खुद को वे अपनी जगह सही ठहराते हैं। कैसे नुकसान पहुंचा सकते हैं ऑनर किलिंग के मामलों को ही लें। यहां बहुत से ऎसे परिवार मिल जाएंगे जो इज्जत के नाम पर बच्चों की जिंदगी तबाह करने में जरा भी नहीं झिझकते। बच्चों की पसंद का जीवनसाथी उन्हें मंजूर नहीं। उनकी इस सोच को कभी सही नहीं ठहराया जा सकता। कुछ पेरेंट्स ईष्र्यालु होते हैं, बच्चों को अच्छी जिंदगी बसर करते देख उन्हें ईष्र्या होती है। वे उन्हें भावनात्मक रूप से ब्लेकमेल की कोशिश या उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाली बातें करने लगते हैं। वह अपने दूसरे बच्चों से उनकी सफलता की तुलना करते हैं और सफल बच्चे उनका शिकार बन जाते हैं। रिश्तेदारों और अपने गु्रप्स में उनके बारे में गलत बातें करते हैं। इसके अलावा वे अपने ही बच्चों में गलतफहमियां पैदा कर उनमें दूरियां बना देते हैं। ऎसे में जो बच्चा बिना वजह उपेक्षा का शिकार होता है वह डिस्टर्ब होने लगता है। हालांकि यह सब करते हुए भी वह उन्हें प्यार करते हैं, सहारा देते हैं, और खुद पर निर्भर रखते हैं। शिकार हैं बच्चे माता-पिता की शत्रुता का सबसे ज्यादा और बडे शिकार हुए हैं इस सेंडविच जनरेशन के बच्चे। एक तरफ तो वे अपने बुजुर्ग माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं के कारण पहले ही बेहद तनाव में हैं और दूसरी ओर वे उनके खुद के वयस्क होते बच्चे गैरवाजिब मांगों से उन्हें परेशान कर देते हैं। किशोरवय बच्चे उनसे आर्थिक, मानसिक और दूसरे सहारे की उम्मीद रखते हैं। उनकी स्थिति वाकई चिंताजनक हो जाती है इस दौर में। विज्ञान की तरक्की ने बुजुगोंü की की औसत उम्र में तो इजाफा कर दिया है लेकिन उनकी सामाजिक स्वीकार्यता उस रूप में नहीं बढ़ पाई है। ऎसे बुजुर्ग मां-बाप कई दृष्टिकोण से स्वार्थी होते चले जाते हैं और एक हद तक अपने ही बच्चों के प्रति कू्रर रवैया रखने लगते हैं। कैसे उबरें और डील करें उनसे उनके जहरबुझे व्यवहार को नोटिस करें और पहचाने कि वे किस स्थिति में किस तरह की बात करते हैं। हालांकि उनके व्यवहार का पूर्व विश्लेषण कर पाना मुश्किल है क्योंकि आखिर माता-पिता हंै वे आपके और यह भरोसा भी मुश्किल से ही होता है कि वे हमारे दुश्मन हो सकते हैं। परेशानी के दौर से बाहर आने के लिए सबसे पहले मानसिक रूप से खुद को सशक्त बनाने की जरूरत है। खुद की रूचि की बातों में ध्यान दें। दूसरों के व्यवहार से ज्यादा देर तक आहत होकर त्याग करते रहने से अच्छा है कि दोनों के बीच कुछ सीमा रेखाएं खींच दें ताकि दूसरे पक्ष को समझ आ जाए कि यह सब अब और नहीं चलेगा। इससे वे दुर्व्यव्यहार से बाज आएंगे। ऎसी ही परिस्थतियों में कई बार बच्चे मां-बाप से पूरी तरह से अलग हो जाने का फैसला कर लेते हैं। खुद को आहत होने से बचाए रखें। पेरेंट्स को शोषण और दुर्व्यवहार करने की इजाजत न दें। कड़े शब्दों में उनसे अपना विरोध जाहिर कर दें। अगर आपको लगता है कि वे आपके प्रति ईष्र्या की भावना रखते हैं और आपकी प्रगति पर रोक लगाने की कोशिश कर रहे हैं तो उन्हें रोक दें। खुद का पूरा ध्यान रखें। अगर हर बात के लिए अपने ईष्र्यालु पेरेंट्स की स्वीकारोक्ति पर निर्भर रहेंगे तो कभी नहीं जान पाएंगे कि क्या सही है क्या गलत। इसलिए उनके हर रिमार्क, हर बात पर गहरी नजर रखें।
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