गुजराती में नख, नासपाती भी कहते हैं। मीठी नाशपति गुरू व ग्राही है। ह्वदय व आमाशय के लिए बलकारक है। उल्टी-चक्कर आने और मूत्राशय में जलन होने पर इसके सेवन से लाभ मिलता है। कमजोरी महसूस हो तो नाशपति खाना बेहतर है। इसे खाने से प्यास कम लगती है और यह अमाशय के लिए भी हितकारी है। इसके सेवन से कफ के साथ खून आना रूक जाता है। खट्टी नाशपति अमाशय व यकृत को बल देती है, भूख बढ़ाती है। इसे खाने से उबकाई आना बंद हो जाती है। पित्त प्रकोप व रक्त की उष्णता को शांत करती है और नया रक्त बनाती है। दस्त के साथ खून आना, जीर्ण अतिसार, संग्रहणी दाह, उल्टी व मस्तिष्क की गर्मी को शांत करती है। अरूचि होने में इसके रस में सैंधा नमक व कालीमिर्च और भुना जीरा पाउडर मिलाकर दिन में कई बार थोड़ा-थोड़ा लेने से भूख खुलकर लगती है। पुराने कब्ज में नाशपति का सेवन सेब की तरह किया जाता है। पुराने कब्ज में इसका रस दिन में तीन-चार बार पीने से आंतों में संग्रहित पुरानी आंव को निकाल बाहर करती है। लगातार कुछ दिन के प्रयोग से आंतों में होने वाली आंव समाप्त हो जाती है। बीस या तीस तोले की मात्रा में पीने से राहत मिलती है। पक्षाघात में लकवे वाले रोगियों को सेब व अंगूर के साथ नाशपती का सेवन दिन में दो-तीन बार करवाने से लाभ होता है।
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