एक शाम जब मैं घर आया तो पत्नी ने बताया, आप जानते हैं कि कैलाश के साथ क्या हुआ? उसने बताना शुरू किया। जैसे ही वह कैलाश की आपबीती बताने लगी मेरा दिमाग पीछे की ओर दौड़ने लगा, करीब दो दशक पुरानी घटना की ओर। मेरी आंटी के घर शादी थी, बहुत-से रिश्तेदार आए थे। कैलाश, मेरा कजिन, वो भी वहां था। माहौल में मस्ती घुली थी। संगीत समारोह का आयोजन करवाने के लिए प्रोफेशनल्स की सेवाएं ली गई थी। डांस परफॉर्मेंस होनी थी, जिसके लिए बच्चे रातभर तैयारी करते। इन सबके बीच ऑर्गेनाइजर ने कुछ कॉन्टेस्ट करवाने की घोषणा भी की, जिसमें प्राइज भी दिए जाने थे। बच्चे इन आयोजनों का स्टेज पर लुत्फ उठा रहे थे। मैं और कैलाश बातों में मशगूल थे। "जो भी बच्चा सबसे पहले शादी का कार्ड लेकर आएगा उसे प्राइज मिलेगा।" ऑर्गेनाइजर ने अनाउंस किया। बच्चों ने सुना नहीं कि बस दौड़ पड़े, कोई अपने रूम में तो कोई मम्मी के पर्स में कार्ड ढूंढने लगे, कुछ पार्किग में खड़ी कारों में कार्ड को तलाशने लगे। कैलाश के बेटे ने भी कार्ड तलाशने की अपनी कवायद शुरू कर दी थी। मेरी नजरें आठ साल की प्यारी-सी बच्ची पर गई। वह कार्ड लेकर भागती हुई ऑर्गेनाइजर के पास जा रही थी। स्टेज तक पहुंची भी न थी कि महेश ने उसके हाथ से कार्ड छीन लिया और ऑर्गेनाइजर को वो कार्ड दिया और प्राइज उसे मिल गया। कैलाश जो इन बातों को गवाह था, मौन साध गया। उसके इस व्यवहार पर मुझे ताज्जुब हुआ। उसके मुताबिक महेश स्मार्ट है, उसने मौके का फायदा उठाया। उसकी इस चतुराई पर वह खुश था और उसने उसकी पीठ भी थपथपाई। इस हरकत से मेरे मन में चिढ़ पैदा हुई, फिर भी मैं कोशिश करता रहा कि अपना ध्यान अगली प्रतियोगिता पर फोकस कर सकूं, लेकिन कैलाश अपने बेटे की चतुराई पर ही बोलता जा रहा था। आखिरकर मैंने उसका ध्यान उस छोटी-सी बच्ची की ओर दिलाया जो कोने में खड़ी चुपचाप रो रही थी। आज महेश ने यह हरकत की है, कल वह किसी और की कोई चीज छीनेगा। तुम्हें उसे रोकना चाहिए, मैंने उससे कहा, लेकिन मेरे शब्दों का उस पर कोई असर न हुआ। "और अब महेश कैलाश को धमकियां दे रहा है।" मेरी पत्नी ने मुझे बताया। वह बताती जा रही थी, उसके शब्दों ने मुझे अतीत से फिर आज में लाकर खड़ा कर दिया। महेश अब बड़ा हो गया है। उसे अब प्रॉपर्टी चाहिए और इसके लिए वह अपने पिता को किसी न किसी रूप में टॉर्चर करता रहता है। पत्नी ने ऎसी कई बातें बताइंü जिससे पता चला कि वह अपने पिता को किस कदर अपमानित करता है। यह सब सुनकर मन बहुत उदास हुआ। मैंने तय किया कि कैलाश से बात करूंगा। उसे फोन लगाया, लेकिन फोन महेश ने उठाया। उसने बहुत विनम्रता से बात की, लेकिन पिता घर पर नहीं हैं, यह बहाने बनाता रहा और कैलाश से बात नहीं करने दी। उसने फोन रख दिया। मैं कुछ नहीं कर सकता था, लेकिन देख रहा था कि कैलाश किसी कोने में खड़ा चुपचाप रो रहा है, ठीक उसी तरह जैसे करीब दो दशक पहले वो छोटी बच्ची खड़ी रो रही थी।
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