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Wednesday, 08 February, 2012
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रमजान में एक नेकी का सवाब सत्तर के बराबर
Wednesday, September 01, 2010, 10:03 hrs IST
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जायका माहे-रमजान में हर तरफ जायकेदार व्यंजनों की भरमार रहती है। रमजान का जिक्र लजीज व्यंजनों के बगैर मुकम्मल नहीं होता। रमजान के खास व्यंजन हंै फैनी, सेवइयां और खजला। सुबह सहरी के वक्त फैनी को दूध में भिगोकर खाया जाता है। इसी तरह सेवइयों को दूध और मावे के साथ पकाया जाता है। फिर इसमें चीनी और सूखे मेवे मिलाकर परोसा जाता है। मीठी डबल रोटी भी सहरी का एक खास व्यंजन है। खास तरह की यह मीठी डबल रोटी अमूमन रमजान में ही ज्यादा देखने को मिलती है।
इफ्तार के पकवानों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। अमूमन रोजा खजूर के साथ खोला जाता है। दिनभर के रोजे के बाद शिकंजी और तरह-तरह के शर्बत गले को तर करते हैं। फलों की चाट इफ्तार का एक अहम हिस्सा है। ताजा फलों की चाट रोजे के बाद ताजगी का अहसास तो कराती ही है, साथ ही यह पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होती है। इसके अलावा जायकेदार पकौडियां और तले मसालेदार चने भी रोजेदारों की पसंद में शामिल हैं। खाने में बिरयानी, नहारी, कोरमा, कीमा, नरगिसी कोफ्ते, सींक कबाब और गोश्त से बने दूसरे लजीज व्यंजन शामिल रहते हैं। इन्हें रोटी या नान के साथ खाया जाता है। रूमाली रोटी भी जायके को बढ़ा देती है। बाकरखानी भी रमजान में खूब खाई जाती है। बिरयानी में हैदराबादी बिरयानी और मुरादाबादी बिरयानी का जवाब नहीं। मीठे में जर्दा, शाही टुकड़े, फिरनी और हलवा-पराठा दस्तरखान की शोभा बढ़ाते हैं। इशरत जहां कहती हैं कि रमजान में यूं तो दिन में ज्यादा काम नहीं होता, लेकिन सहरी के वक्त और शाम को काम बढ़ जाता है। इफ्तार के लिए खाना घर में तैयार होता है, लेकिन रोटियों की जगह हम बाहर से नान या रूमाली रोटियां मंगाना पसंद करते हैं। रमजान में रोटी बनाने वालों का काम बढ़ जाता है। दिल्ली में जामा मस्जिद के पास रोटी बनाने वालों की कई दुकानें हैं। यहां तरह-तरह की रोटियां बनाई जाती हैं, जैसे रूमाली रोटी, नान, बेसनी रोटी आदि। इलाके के होटल वाले भी इन्हीं से रोटियां मंगाते हैं।
चमकते-दमकते बाजार
रमजान में बाजार की रौनक को चार चांद लग जाते हैं। दुकानों पर चमचमाते जरी वाले व अन्य वैरायटी के कपड़े, नक्काशी वाले पारंपरिक बर्तन और इत्र की महक के बीच खरीददारी करती औरतें, साथ में चहकते बच्चे। इन दिनों नया सामान बाजार में आने लगता है। लोग ईद की खरीददारी शुरू कर देते हैं। आधी रात तक बाजार सजते हैं। इस दौरान सबसे ज्यादा कपड़ों की खरीददारी होती है। दर्जियों का काम बढ़ जाता है। इसलिए महिलाएं ईद से पहले ही कपड़े सिलवा लेना चाहती हैं। नेट, शिफॉन, जॉर्जेट पर कुन्दन वर्क, सीक्वेंस वर्क, रेशम वर्क और मोतियों का काम महिलाओं को खासा आकçष्ाüत करता है। बाजारों में कोलकाता, सूरत और मुंबई के कपड़ों की धूम रहती है। सदाबहार चिकन का काम खूब पसंद किया जाता है। ईद के महीने में शादी-ब्याह भी ज्यादा होते हैं। इसलिए शादी की शॉपिंग भी जमकर होती है। शादियों में आज भी गरारे को खासा पसंद किया जाता है।
चूडियों और मेहंदी के बिना ईद की खरीददारी अधूरी है। रंग-बिरंगी चूडियां सदियों से औरतों को लुभाती रही हैं। चूडियों के बगैर सिंगार पूरा नहीं होता। कांच की चूडियां, लाख की चूडियां, सोने-चांदी की चूडियां और मेटल की चूडियां। सोने की चूडियां तो अमीर वर्ग तक ही सीमित हैं। आज भी महिलाओं को पारंपरिक कांच की रंग-बिरंगी चूडियां ही ज्यादा आकçष्ाüत करती हैं। कांच की नगों वाली चूडियों की मांग है। कॉलेज जाने वाली और कामकाजी महिलाएं मेटल और प्लास्टिक की चूडियां पसंद करती हैं, क्योंकि यह कम आवाज करती हैं।
मस्जिदों के पास लगने वाली हाटें भी रमजान की रौनक को बढ़ाती हैं। इत्र, लोबान और अगरबत्तियों से महक माहौल को सुगंधित कर देती है। इत्र जन्नतुल-फिरदौस, बेला, गुलाब, चमेली और हिना का खूब पसंद किया जाता है। रमजान में मिस्वाक से दांत साफ करना सुन्नत माना जाता है। इसकी मांग भी बढ़ जाती है। रमजान में टोपियों की बिक्री भी खूब होती है। रमजान के मौके पर इस्लामी साहित्य, तकरीरों, नअत, हम्द, कव्वालियों की कैसेट सीडी और डीवीडी की मांग बढ़ जाती है।
यूं तो दुनियाभर में खासकर इस्लामी देशों में रमजान बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, लेकिन भारत की बात ही कुछ और है। यहां गैर मुस्लिम लोग भी रोजे रखते हैं। कंवर सिंह पिछले कई सालों से रमजान में रोजे रखते आ रहे हैं। वे सूरज निकलने के बाद से सूरज छुपने तक कुछ नहीं खाते। उन्हें विश्वास है कि अल्लाह उनके रोजों को जरूर कुबूल करेगा। भारत की यही महानता है कि यहां सभी धर्मों के लोग मिल-जुलकर त्योहार मनाते हैं। यही जज्बात गंगा-जमुनी तहजीब को बरकरार रखते हैं।
इबादत
रमजान से पहले मस्जिदों में रंग-रोगन का काम पूरा कर लिया जाता है। मस्जिदों में शामियाने लग जाते हैं। रमजान का चांद देखने के साथ ही इशा की नमाज के बाद तरावीह पढ़ने का सिलसिला शुरू हो जाता है। फरहाना कहती हैं- इस महीने में कुरआन नाजिल हुआ, इसलिए रमजान बहुत खास है। हर मुसलमान के लिए यह महीना मुकद्दस और आला है। हमें इस महीने की अहमियत को समझते हुए ज्यादा से ज्यादा वक्त इबादत में गुजारना चाहिए। वैसे भी रमजान में हर नेकी और इबादत का सवाब साल के दूसरे महीनों से ज्यादा ही मिलता है। वे कहती हैं कि शबे-कद्र को उनके परिवार के सभी लोग रातभर जागते हैं। मर्द इबादत के लिए मस्जिदों में चले जाते हैं और औरतें घर पर इबादत करती हैं।
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