वादे हैं, वादों का क्या
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Monday, February 06, 2012, 08:51 hrs IST
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पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। सभी दल चुनावी दंगल मे कूद पड़े हैं। घोषणा पत्रों में वादों की झड़ी लग गई हैं। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण शुरू हो गया है। जातीय समीकरण ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदल दी है। आम मतदाताओं के पास सीमित विकल्प रह गए हैं। नेताओं की चाल और चरित्र संदेह के दायरे में हैं। चुनाव जीतने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। अनर्गल बयानबाजी जारी है। सभी दलों को बस जीतने की चिंता है। इसके लिए वे मतदाता को गुमराह भी कर रहे हैं। जीतने पर लैपटोप से लेकर गाय तक देने के वादे किए जा रहे हैं। ऎसे-ऎसे वादे किए जा रहे हैं, जो पूरे नहीं किए जा सकते। राजनीतिक दलों को पता है कि चुनाव के दौरान किए गए वादों को पूरा करने की कोई बाध्यता नहीं है। इसलिए वे इस तरह के वादे कर रहे हैं। आखिर ऎसे नेताओं को सबक कौन सिखाएगा? मतदाता पर ही यह जिम्मेदारी है, लेकिन नेताओं ने मतदाताओं को भ्रमित और विभाजित कर दिया है। - भागचंद पिंगोलिया, हस्तेड़ा, जयपुर
मानसिक विलास जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल जिस तरह से खुलेआम मदिरापान और धूम्रपान हुआ, उससे सिर शर्म से झुक गया। यह साहित्यिक कम और मौज-मस्ती का स्थल ज्यादा नजर आया, जहां कानूनों का भी मखौल उड़ाया गया। साहित्यकार समाज में मूल्य स्थापित करने का भी काम करते हैं। इस आयोजन में जो माहौल रहा है, उससे किस तरह के मूल्य स्थापित हुए। हां, नई पीढ़ी में कुसंस्कारों की बीजारोपण जरूर हुआ। जिस साहित्य में सृजन न हो और साहित्यकार अपने लिखे पर अमल न करे, वह मानसिक विलास है। जयपुर फेस्टिवल में यही हुआ। ऎसे आयोजन में भाग लेने वाले लेखकों को भी सोच विचार करना चाहिए। उन्हें कुछ ऎसा करना चाहिए जिस पर देश की जनता नाज करे। विवाद के लिए किसी आयोजन को याद करना ठीक नहीं। - गोविंददेव शर्मा, मालवीय नगर, जयपुर
पोल खुलने लगी बी-2 बाईपास की पोल धीरे-धीरे खुल रही है। अभी से सड़कें क्षतिग्रस्त होना शुरू हो गई हैं। इससे जाहिर है कि भारी वाहनों के लिए इन सड़कों का निर्माण नहीं किया गया। इसके बावजूद यहां से भारी वाहनों की आवाजाही शुरू कर दी गई। इससे हादसे हो रहे हैं। सड़कें टूटने से पानी की पाइप लाइनें भी क्षतिग्रस्त हो रही हैं। हाल ही इस तरह का वाकया हो चुका है। इससे लोगों को परेशानी हो रही है। इसकी बावजूद सरकार इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रही। लगता है सरकार को किसी बडे हादसे का इंतजार है। - प्रमोद जैन, थड़ी मार्केट, जयपुर
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