परमात्मा को मन से, ह्वदय से ही प्राप्त करना चाहिए, क्योंकि वह इंद्रियों के द्वारा नहीं जाना जा सकता। वह इंद्रियों का विषय ही नहीं है। जैसे आंख का विषय रूप-दृश्य है, कान का शब्द, त्वचा का स्पर्श, नाक का गंध और जिह्वा का विषय रस है। वे इन्हीं को जान सकती हैं। वह तो मन में ही मन के द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है। ह्वदय में मन के भावों द्वारा हम उसका अस्तित्व मानते हैं, फिर उसके व्यक्तित्व की अवधारणा करते हैं, फिर मनीषा के द्वारा वह कौन है, कैसा है, कितने विस्तार, किस स्वभाव और गुण वाला है, उसका चिंतन करते हैं। ऎसा मानना चाहिए कि परमात्मा है, फिर उसे तत्व से जानने का प्रयत्न करना चाहिए। जो ऎसा मानकर साधना प्रारंभ करता है, उसे धीरे-धीरे ह्वदय में परमात्मा का अनुभव होने लगता है और वह क्रमश: तत्व भाव को ही प्राप्त हो जाता है। भाव से ही किसी प्रतिमा या चित्र के प्रति प्रीति हो जाती है और उसमें भगवान दिखते हैं। पूरा जीवन ही उन पर न्यौछावर हो जाता है। यदि भाव न हो, तो वह पत्थर है। प्रेम की भावना होने पर ही मनुष्य किसी प्रतिमा के समक्ष आंसू बहाता है या किसी व्यक्ति के लिए अपना जीवन भी त्याग देता है, परंतु मन में द्वेष या अविश्वास की भावना होने पर वह व्यक्ति कितना भी गुणी, सह्वदय परोपकारी और आकर्षक हो, उसके प्रति प्रीति नहीं होती। भाव का ही महत्व है कि मां अपने बदसूरत, रूग्ण पुत्र के लिए दुख सहती है, त्याग करती है। इसी प्रकार एक बेटा अपनी मां के लिए किसी से भी लड़ने को तैयार हो जाता है। जिस व्यक्ति का मन प्रसन्न है, उसके लिए सारा संसार सुख पूर्ण है। आत्मा में यदि यह विश्वास है कि भगवान प्रेमी और सबके पालक हैं, तो साधना में चाहे वह सगुण हो या निर्गुण, साधक को आनंद प्राप्त होता है। यदि भाव ही नहीं है, तो प्रतीत होता है कि कहीं कुछ नहीं है।
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