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हरदत्त की कहानी
Sunday, July 25, 2010, 10:48 hrs IST
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यह उस युवक क्रांतिकारी की गाथा थी जिसने साइबेरिया की जेलों में डेढ़ दशक से भी ज्यादा अपना जीवन बिताया था। बाद में निर्दोष्ा साबित होने पर इसी सरकार ने अपनी गलतियों और ज्यादतियों की भरपाई करने में कोई कसर छोड़ नहीं रखी थी। उन्हें ताशकंद विश्वविद्यालय के हिंदी-उर्दू विभाग का अध्यक्ष बनाया गया था। जो उनके जीवन के तकलीफों और प्रसन्नताओं को औपन्यासिक जीवनी के रूप में अमृता जी ने लिखा था। उसी के बाद लोग जान पाए थे कि मदनमोहन हरदत्त कौन हंै। किताब "हरदत्त का जिंदगीनामा" के "जिंदगीनामा" शब्द पर कृष्णा सोबती को कड़ा एतराज था।

यह शीर्षक भी शायद ही किसी के जेहन में हो। कहीं होगा भी तो कुछ इस तरह कि कृष्णा सोबती और अमृता प्रीतम के बीच एक शब्द "जिंदगीनामा" को लेकर विवाद इतना गहराया कि दिल्ली हाईकोर्ट तक चला गया। जबकि इस मामले में विवाद की गंुजाइश ही नहीं थी। अमृता प्रीतम की एक किताब आई थी -"हरदत्त का जिंदगीनामा"। यह उस युवक क्रांतिकारी की गाथा थी जिसने साइबेरिया की जेलों में डेढ़ दशक से भी ज्यादा अपना जीवन बिताया था। बाद में निर्दोष्ा साबित होने पर इसी सरकार ने अपनी गलतियों और ज्यादतियों की भरपाई करने में कोई कसर छोड़ नहीं रखी थी। उन्हें ताशकंद विश्वविद्यालय के हिंदी-उर्दू विभाग का अध्यक्ष बनाया गया था। जो उनके जीवन के तकलीफों और प्रसन्नताओं को औपन्यासिक जीवनी के रूप में अमृता जी ने लिखा था। उसी के बाद लोग जान पाए थे कि मदनमोहन हरदत्त कौन हैं। किताब "हरदत्त का जिंदगीनामा" के "जिंदगीनामा" शब्द पर कृष्णा सोबती को कड़ा एतराज था। उनका मानना था कि यह शब्द उन्होंने ही मौलिक रूप से रचा है अत: इस पर सिर्फ उनका ही हक है। कोई दूसरा इसका इस्तेमाल करें तो अंतरराष्ट्रीय इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी एक्ट के उल्लंघन के कारण सजा का पात्र होगा। अब यह लचर तर्क किसे मंजूर हो सकता है। भाषा पर, शब्दों पर कौन एक्ट लगाएगा। शब्दों से पुस्तक बनती है और शब्दों की लड़ाई शब्दों से ही लड़ी जानी चाहिए और अकेले शब्दों से। मगर कृष्णा जी अड़ गईं और मामला कोर्ट में चला गया कालांतर में वो खारिज भी हो गया, जो कि होना ही था।

1982-83 में मैंने मदन मोहन हरदत्त के जीवन पर एक छोटी फिल्म बनाई थी। तब वे कालकाजी की एक गंदी बस्ती में, शोचनीय दशा में रहते थे। उनसे काफी निकटता हो गई थी। पचासों बार लम्बी-लम्बी बातें होती थीं। वैसे वो अपने एक मुसलमान दोस्त के साथ अफगानिस्तान के रास्ते, वेश बदल-बदल कर सोवियत संघ पहुंचे थे। मुसलमान दोस्त तो घबराकर अफगानिस्तान से ही वापस हो लिया था पर भगत सिंह के आदर्शो के सहारे वे जरूर सोवियत संघ पहुंच गए थे। पर यह पहुंचना सुखद नहीं था। उन्हे ब्रिटिश जासूस समझकर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। लम्बा ट्रायल हुआ। सुदूर साइबेरिया की जेल के जिस सेल में वे बंद थे वहां एक और कैदी था। था तो वह जहीन और साहित्य प्रेमी भी लेकिन गंभीर किस्म के अपराधों में रम चुका था और जेल की सजा काट रहा था। उसके पास उसकी छोटी बहन के खत आते थे जिन्हें वो हरदत्त को पढ़वा देता। वे पत्र उन दोनो के लिए जीवन रेखा बनने लगे। उनमेें आजाद धरती-आसमान, खेत-खलिहान, फूलों और पत्तों, चिडियो-तितलियो नदी-पहाड़, झरनों का वर्णन होता था। नई पुस्तकों-पत्रिकाओं की जानकारियां होती थीं। बदलते सोवियत समाज के बारे में विवरण होते थे। दुनिया जहान की बातें होती थीं। ये पत्र रोचक और प्रवाहमान भाषा में लिखे हैं। लिखावट भी सुंदर थी।

एक दिन मदन मोहन ने अपने साथी कैदी से कुछ हिचक के साथ पूछा- "क्या तुम मुझे अपनी बहन का पता दे सकते हो। मैं भी उसे पत्र लिखना चाहता हूं। शायद उसे मेरे पत्र अच्छे लगे और मेरे पत्रों का भी जवाब वह भेजे।" साथी कैदी सहर्ष मान गया। हरदत्त वषांüे सोवियत में रह चुके थे। रूसी भाषा अच्छी तरह बोलते थे- लिखते भी थे। लड़की का नाम नतालिया था। हरदत्त ने अपना परिचय और बेगुनाही के बारे में लिखकर नतालिया को भेजा। छोटी-छोटी कविताएं भी लिखकर वे भेजते थे। सुखद आpर्य! हरदत्त जी के पत्रों के जवाब भी आने लगे। पहले पत्र संक्षिप्त होते थे। बाद में विस्तार पाते गए। पत्रों के साथ नतालिया उन्हें पत्रिकाओं की कटिंग्स, थिएटर के छोटे पोस्टर, पुस्तकों के अंश वगैरह भी भेजने लगी। पत्रों का सिलसिला कब दोस्ती में बदला और कब प्यार में पता ही न चला। नतालिया ने हरदत्त की रिहाई के लिए कड़ी मेहनत की। वह भारतीय दूतावास के जरिए, किसी तरह भारत के विदेश मंत्रालय तक कुछ दस्तावेज भिजवाने में सफल रही। आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तक मामला पहुंचा और उन्होंने जान लिया कि मदन मोहन बेकसूर है। उनके निजी प्रयासों से वे जेल से बाहर आए। उनका साथी अभी जेल में ही था। जेल के मुख्य द्वार पर एक ह्वष्टपुष्ट रूसी युवती हाथों में गुलदस्ता लिए खड़ी थी। वह नतालिया थी। अन्तत: दोनों ने शादी कर ली हरदत्त को ताशकंद विश्वविद्यालय में एशियाई विभाग का अध्यक्ष बनाया गया जहां वे कई वष्ाü रहे। इन वर्षोü मे उनके कोई संतान न हुई तो उन्होंने एक अनाथ जॉर्जियन कन्या को गोद लिया और पालने-पोसने लगे।

ताशकंद में कई वर्ष गुजरे पर अब मदन मोहन का मन वहां नहीं लग रहा था। वे "आजाद हिंदुस्तान" को देखना चाहते थे। आखिरकार पत्नी और बच्ची को लेकर वे दिल्ली जाने की तैयारियों में जुट गए। अपने परिवारजनों और नाते-रिश्तेदारों को उन्होंने कई पत्र पहले ही भेज दिए थे। और यह सोचकर कि वे अपने वतन लौट रहे हैं जहां क्रंातिकारी के रूप में उनका स्वागत होगा, वे दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरे। औपचारिकताएं पूरी कर जब वे बाहर आए तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वहां कोई उन्हें लेने नहीं आया था। दोनो दुखी और मायूस रहे। हवाई अaे पर, सड़कों पर, मुहल्लों में, दफ्तरों में वो हिन्दुस्तानियों का व्यवहार देखकर वे क्षुब्ध हो उठे। यह कौन सा हिन्दुस्तान है? भगत सिंह के सपनों और आदर्शो वाला तो नहीं। यहां तो आपाधापी है, अराजकता है, मारामारी है।

वे अपने गांव भी गए पर बचे-खुचे परिजनों ने उनमें कोई रूचि नहीं दिखाई। वे उनसे मिलना ही नहीं चाहते थे। उन पर जेल में लम्बा जीवन काटने का ठप्पा लगा था। वे किन्हें समझाते कि उन पर लगे आरोप झूठे थे और वे बेदाग और निर्दोष छूटे बल्कि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद पर भी रहे। हर तरफ से निराश होकर वे दिल्ली की कालाकाजी की गंदी बस्ती में रहने लगे। मगर बदहाली और गुरबत के चलते, जब उनकी पत्नी की सेहत गिरने लगी तो किसी तरह उन्हें मनाकर और कड़ी मशक्कत के बाद हुई धन की व्यवस्था से उन्होंने नतालिया को वापस रूस भेज दिया। यह आश्वासन देकर कि या तो हालात सुधरते हैं तो वे उसे वापस बुला लेगें या फिर खुद ही रूस चले आएगें। जब वे अकेले कालका जी की गंदी बस्ती में रहते थे तब उन्हीं दिनों उनसे मेरी मुलाकात हुई थी और उसी के बाद मैंने उन पर फिल्म बनाई थी।

उन्हीं दिनों एक शूटिंग के सिलसिले में मुझे इलाहाबाद जाना पड़ा। फुर्सत के एक दिन मैं वहां पुस्तकों की एक दुकान में चला गया। अचानक देखा कि कुछ किताबों के बीच ऑक्सफोर्ड की एक अंग्रेजी डिक्शनरी उपेक्षित सी पड़ी है। वह पॉकेट डिक्शनरी थी। उसके शुरू के अनेक पृष्ठ फटे हुए थे। पर बाद में जैड तक के सभी पृष्ठ सुरक्षित थे। पीले पन्नों पर जैड अक्षर तक मेरी अंगुलियां उलट गईं। वहां शब्द मिला जिंदगीनामा, मैं उछल पड़ा। मैंने दुकानदार से उसे खरीदने की इच्छा जाहिर की। वह हंसने लगा। "अरे साहब! वैसे ही इसकी हालत खस्ता है।

इसके क्या पैसे लेने। आप इसे रख लीजिए।" मैं उसे दिल्ली ले आया। उसके जैड अक्षर वाले पन्ने की जिंदगीनामा जहां लिखा था उसकी जीरोक्स प्रति बनवाई और उसे अमृता जी को दे आया। इसी दरमियान मुझे पता चला कि कलकत्ता के एक उर्दू अखबार में जिंदगीनामा के नाम से एक कॉलम छपता था। मगर अखबार पन्द्रह- बीस साल पहले बंद हो चुका था मगर कलकत्ता के एक पुराने दोस्त ने बहुत जतन करके अखबार की फाइले ढूंढ निकालीं और जिंदगीनामा कॉलम की कई किस्तों की जीरोक्स प्रतियां मुझे भेज दीं और यह सामग्री भी मैंने अमृता जी को भिजवाई। मेरा इरादा किसी की हार-जीत का नहीं था, तथ्यों के आधार पर मामले को रफा-दफा करवाना था ताकि लेखकीय सौहार्द खराब न हो। कुछ सामग्री जुटाकर कमलेश्वर जी ने भी अमृता जी की सहायता की।

मदन मोहन हरदत्त ने अनेक लेख भारत की राजनीति और भारत के भविष्य पर लिखे थे। उन्होंने कई संस्थानों से जुड़कर शोध ग्रंथ तैयार कराए थे। ताशकंद विश्वविद्यालय में हिंदी-उर्दू की पढ़ाई को आसान और रोचक बनाने के लिए उन्होंने छोटी-छोटी पुस्तकें छपाई थीं जो विद्यार्थियों में काफी लोकप्रिय हुई थीं। उन्हीं की तर्ज पर रूस के दूसरे विश्वविद्यालयों ने भी वैसा ही किया था। इन पुस्तिकाओं में दुनिया, रूस और भारत के साहित्य और साहित्यकारों के बारे पर जानकारियां होती थीं। ये पुस्तिकाएं सचित्र थीं। हमारे विश्वविद्यालय यदि ताशकंद विश्वविद्यालय से संपर्क साधकर इन पुस्तिकाओं के नमूने मंगवाएं तो यह उपयोगी होगा। मदनमोहन हरदत्त चाहते थे कि रूस से लौटने के बाद उनके जीवन के उतार-चढ़ावों पर कोई व्यक्ति पुस्तक लिखे तो यह पाठकों को अच्छा लगेगा। शायद कभी कोई लिखे। शायद मैं ही।

कुबेर दत्त
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