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Saturday, 19 May, 2012
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तू नहीं तो और सही
Monday, December 12, 2011, 12:58 hrs IST
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बोल्ड दर बोल्ड हो रही हैं हमारी फिल्मों की नायिकाएं। या क हिए कि अपनी इच्छाओं को पूरा करना शुरू कर दिया है। पर्दे और घूंघट से बाहर निकले तो जमाना हो गया, पर अब उन्होंने खींची गई लकीरों को भी लांघना शुरू कर दिया है। जहां पुरानी फिल्मों की नायिकाएं प्यार तो करती थीं, मगर छुप-छुपकर। होटल, रेस्त्रां या रिसोर्ट तो भूल ही जाइए। नायक से किसी बगीचे में मिलना होता था, वो भी चोरी-छिपे। यहां तक पहुंचने में भी वह अभिनेता को घंटों इंतजार कराती थीं। तभी तो आइए आपका इंतजार था..., अभी अभी तो आए हो अभी चले जाओगे... जैसे गीतों की रचना हुई। वहीं इस जमाने की देव डी की नायिका से मिलिए...। इसकी बोल्डनेस के आगे दुनिया-समाज सब बौना नकार आता है। जिस प्यार को पाने की खातिर वह किसी भी हद तक जाने को तैयार है, तो उसी प्रेमी की शक भरी नकारे वह बर्दाश्त नहीं कर पाती...और घर वालों की पसंद के लड़के से चट मंगनी, पट ब्याह कर घर बसा लेती है। हो भी क्यूं ना, अब प्यार में टूटे दिल को थामें जिंदगी भर मातम मनाने का दौर बीत चुका है। एक रिपोर्ट-

इन्हें समझौता मंजूर नहीं...
यहां सबकुछ हार्ड एंड फास्ट है। बिलकुल बैंड बाजा बारात की श्रुति कक्कड़ की तरह। वह जानती है कि उसे जिंदगी से क्या चाहिए। शादी और पार्टी के इवेंट मैनेज कराते हुए 25 साल की उम्र में वह कॅरियर तो प्लान कर लेती है, पर बिट्टू से मिलने के बाद लाइफ भी प्लान करने लगती है। सबकुछ हो जाने के बाद भी जब बिट्टू रिश्ता स्वीकारने में अनमनी दिखाता है, तो श्रुति को मिनट नहीं लगती उससे किनारा करने में। इसके बाद घर वालों की पसंद के लड़के से उसकी टेलीफोनिक डेट शुरू हो जाती है। मतलब तू नहीं, तो कोई और सही का जुमला अब केवल नायकों के लिए नहीं रह गया। नायिकाएं इससे भी कहीं आगे आ गई हैं। जहां पुरानी फिल्मों की विधवा अभिनेत्री को दूसरी शादी के बारे में सोचते ही सिहरन होने लगती थी, समाज से मिलने वाले तानों के बारे में सोचकर ही वह सहम जाती थी। वहीं फिल्म इश्कियां की विधवा हीरोइन कृष्णा वर्मा दो लोगों से एक साथ अफेयर चलाती है। दरअसल आज की अभिनेत्री सही और गलत से परे अपनी इच्छा को सर्वोपरी रखती है। कृष्णा को अपने पति तक पहुंचना था उसके लिए वह किसी भी रास्ते से होकर गुजर सकती थी। गांव और समाज की परवाह किए बिना अपने पति के दो पहचान वालों को वह घर में पनाह देती है। फिर उन्हीं से दिल लगाने का नाटक करती है और इसी नाटक में उसे सचमुच प्यार हो जाता है। आज की नायिका जानती है कि दुनिया केवल आपकी खुशी में शरीक हो सकती है दुख तो आपको अकेले ही झेलना है। उसका पति ही उसे मारना चाहता था, जब कृष्णा यह बात जान जाती है, तो सच को सामने लाकर अंजाम तक पहंुचाना ही उसका मकसद बन जाता है। साफ है कि अब नायिका को मंजूर नहीं कि अपने फायदे के लिए कोई उसका इस्तेमाल करे। कृष्णा यह साबित कर देती है कि वह लाचार या बोझ नहीं है, साथ मिले तो सही है नहीं तो अकेले रहना वह जानती है। खुद को लेकर सजग रहने वाली अभिनेत्री कई बार स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के बीच सामंजस्य नहीं बना पाती। तनु वेड्स मनु की तनु समझ ही नहीं पाती कि उसे क्या चाहिए। जिस लड़के से शादी करने के लिए वह घर से भागने को आतुर है, जब राजी खुशी वह लड़का उसे मिलने लगता है तब भी तनु परेशान है। दरअसल वह अपनी पसंद पर भरोसा ही नहीं कर पाती। भावनाओं का सैलाब और समझ का भटकाव उसे उलझाए रखता है। देर से ही सही पर उसे अपने दिल की बात समझ में आ जाती है और तनु हमेशा के लिए मनु की हो जाती है। पुरानी फिल्मों में दरवाजे से बारात लौटने पर जहां दुल्हन मौत को गले लगा लेती थी, वहीं आज की दुल्हन तनु बारात चौखट से लौटा देती है। शादी करनी है या नहीं करनी है और करनी है तो किससे करनी है? भले ही ये सवाल लगातार तनु को उलझाए रखते हैं, पर अपने फैसलों के साथ कोई समझौता उसे मंजूर नहीं।

इस मसले पर फिल्म रॉकस्टार की नायिका हीर को तनु से प्रभावित कह सकते हैं या कहिए कि वह तनु की ही अगली पीढ़ी है। तनु की तरह ही हीर भी दिल्ली में अपनी पढ़ाई पूरी करती है। जहां तनु की मुलाकात अपने प्यार से (जिससे वह खुद भी अंजान थी) बहुत ही सामाजिक तामझाम के साथ होती है, वहीं हीर का अपने प्यार से कॉलेज में ही मिलना होता है। (संयोगवश तब तक हीर भी उससे अंजान होती है) परिस्थितियां अलग हैं, पर दोनों ही अपने प्यार को पहचान नहीं पातीं। जहां तनु शादी से पहले समझ जाती है कि उसे कौन चाहिए। वहीं हीर शादी के बाद समझ पाती है। यह भी कह सकते हैं कि हीर तनु की तहर बोल्ड स्टेप नहीं उठा पाई। बावजूद इसके शादी के बाद अपने पुराने प्रेमी के साथ वक्त गुजारना, घूमना-फिरना और मौजमस्ती उसे जरा नहीं अखरती। वह गलत राह पर जा रही है, जब उसे इसका भान होता है, तो अपने आशिक को ठुकराने में वह दो पल नहीं गवांती। पर प्यार के बिना जीना उसके वश में नहीं, शायद इसीलिए पति से तलाक लिए बिना वह अपने प्रेमी की हो जाती है।

इन्होंने दिया हौसला...
गौरतलब है कि हमारी अभिनेत्रियां एकाएक इतनी मुखर नहीं हो गईं। लज्जा, क्या कहना और सलाम नमस्ते जैसी फिल्मों की नायिकाओं ने इनको हौसला दिया है। लज्जा में जहां वैदेही अपने बच्चे को अपने पति से बचाने के लिए दर दर भटकती है, पर हार नहीं मानती। मैथिली दहेज लोभी ससुराल वालों की मांगों से तंग आकर अपनी बारात लौटा देती है, जानकी अपमान के घूंट पीती है, पर घुटने नहीं टेकती, रामदुलारी गांव के जमीदार के भय से बाहर आकर गांव के लोगों को पढ़ाने और कम्प्यूटर सिखाने का जिम्मा उठती है। उन्हें आत्मनिर्भर बनाती है। हालांकि जानकी और रामदुलारी को भयावह अंजाम से गुजरना पड़ता है, पर अपने स्वाभिमान को नजरअंदाज नहीं कर पातीं वह। फिल्म लव आजकल में आज और कल दोनों दौर के प्यार को दिखाया गया है। यहां साफ है जहां पुरानी नायिका अपने घर वालों के सामने अपनी बात नहीं रख पाती, वहीं लव आजकल की नायिका हनीमून के पहले ही दिन अपने पति से कहती है कि वह अपने पहले प्यार को आज तक नहीं भूल पाई... और पति से अलग हो जाती है। बिना यह जाने कि उसका प्यार कब तक उसके पास लौटकर आएगा और आएगा भी या नहीं...। साफतौर पर आज की नायिका को वह रिश्ता मंजूर नहीं, जिसमें उसे खुशी न मिले। वह स्पष्ट और बेबाक हुई है। बात करते हैं फिल्म क्या कहना की प्रिया बख्शी की। जो कॉलेज गोइंग स्टूडेंट है। कॉलेज के एक रईसजादे राहुल के प्यार के झांसे में फंस जाती है, जो उसे अविवाहित मां बनाकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह फेर लेता है। इससे प्रिया टूटती जरूर है, पर हारती नहीं। ऎसी अवस्था में कॉलेज जाना और अपने साथियों द्वारा ही मजाक उड़ाया जाना, घर से निकाल दिया जाना सबकुछ वह बर्दाश्त करती है...पर अपने अजन्मे बच्चे को मारना नहीं चाहती...। ख्ौर, चाहे जितनी मुश्किलें आएं, पर मजबूत इरादों की बदौलत हर झंझावात से गुजरने को तैयार हैं हमारी नायिका। ऎसे में जब प्रिया का दोस्त अजय उसका साथ निभाने के लिए आगे आता है, तो वह माफी मांग रहे राहुल को भी ठोकर मार देती है। मतलब, तुम साथ दो तो अच्छा है और न दो तो और भी अच्छा है। शायद इसी तर्ज पर नायिका अपनी क्षमताओं को बेहतर तरीके से जानना चाहती है। फिल्म सलाम नमस्ते की नायिका अंबर शादी से पहले निखिल अरोड़ा उर्फ निक को जानना समझना चाहती है। इस सबके लिए सहारा लिया जाता है लिव इन का। इसी दौरान अंबर प्रेगनेंट हो जाती है लेकिन निखिल बच्चा नहीं चाहता। बावजूद इसके अंबर अपनी जिम्मेदारी पर अपने बच्चे को दुनिया में लाना चाहती है।

हमारी नायिका जानती है कि बच्चों की परवरिश के लिए उसे किसी पुरूष्ा के सहारे की जरूरत नहीं है, यह काम वह अकेले भी बेहतर तरीके से कर सकती है। सही भी तो है, बदलते समय के साथ कदम-ताल करना। यह आज की मांग है और जरूरत भी। सीमाओं में बंधे रहकर हमारी नायिका पिछड़ना नहीं चाहतीं। कहा जाता है कि सिनेमा समाज का आइना होता है, लेकिन इस संदर्भ में यह निष्कष्ाü निकालना कठिन है कि सिनेमा समाज से प्रभावित हो रहा है या समाज सिनेमा से।
गरिमा सिंह
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