कल विश्व महिला दिवस है, राजस्थान की एक साधारण महिला के असाधारण जीवन और संघर्ष से निपजी आत्मकथा जो अपनी भंाजी को संबोघित पत्रों के रूप में लिखी गई थी, हार्पर हिंदी ने हाल ही प्रकाशित की है, उसके कुछ खास अंश ....
8/4/1998 टीटू बेटी, जीवन का हर मोड़, घटनाओं का हर कोण एक नुकीले कांटे जैसा चुभता है। उस चुभन को चीखने न देना एक ऎसे चुप को जन्म देता है, जिसे मैंने बड़े दुलार से अपनाया और अपने में समा लिया। तुम्हारे अनवरत आग्रह के फलस्वरूप आज मैं अपनी उस चहेते चुप्पी को अपने से अलग कर सकूं, ऎसा प्रयास कर रही हूं। तुम मानो न मानो टीटू पर समय के फलकों पर लिखा यथार्थ उजागर करना कितना दूभर है। अज्ञेयजी की "असाध्य वीणा" जैसा ही..। समय को क्या कहूं? सत्य का निर्वाह? विचित्र अनुभूतियों का अनूठा संगम? सब-कुछ इंद्रजाल जैसा एक कौतुक। इंद्रजाल जैसा ही जादूभरा। अपना इतिहास अपने लिए दुख नहीं बन जाता क्या? लाख चाहते भी उसे भुला नहीं पाऊंगी। काश भूल पाती। कल उस बचपन को मुड़कर देखूंगी, जिसकी यादें एक सुखद स्वप्न जैसी अभी भी मुझे विभोर कर देती हैं। अभी थक-सी रही हूं। बस। प्यार, मौसी का --- 19/4/1998 टीटू बेटी! तुमने मुझे ऎसे झरोखे में ला बिठाया, जिसमें से झांकने पर कितनी यादें दिखाई दे रही हैं। अभी भी उसमें अम्मा ही अम्मा देख पा रही हूं। उनके विविध रूप तुम्हें अब तक दिखाए, कितना और कुछ बाकी है, पता नहीं। धीरे-धीरे उस कहानी के नए सफे खुलते जा रहे हैं। कहां जाकर थमेंगे, अभी बताना संभव नहीं। ज्ञान का अनंत भंडार अम्मा। उनकी स्मरणशक्ति अपूर्व थी, इस कारण ही तो उन्हें गीता और रामायण कण्ठस्थ थे। गीता के किस अध्याय का कौन-सा श्लोक है, यह वह बेहिचक बता देतीं। रामायण (रामचरितमानस) के किस काण्ड की कौन-सी चौपाई या दोहा है, यह बताना उनके लिए बच्चों के खेल जैसा था। अपने परिवार में उनके बाद शरण भाई कमोबेश उनकी श्रेणी में आते थे, जिस दिन अम्मा कुछ खिलवाड़ के मूड में होतीं, शरण भाई के सामने अंग्रेजी की किसी कविता का एक या दो स्टैन्जा रखकर उन्हें तीन बार पढ़ने का अवसर देतीं, फिर उसे स्वयं एक बार देख लेती। दरअसल शरण भाई को भी अपनी याद्दाश्त पर नाज था, इसीलिए अम्मा की दी हर चुनौती वह स्वीकार करते। दादा इसके साक्षी बनते। हम बच्चे समझते अघिक नहीं थे पर मूकदर्शक बनकर सामने खड़े रहते। पहले अम्मा उस पढ़े हुए पद्यांश को निर्बाध सुना देतीं, फिर शरण भाई की पारी आती। बड़े आत्मविश्वास से वह सुनाना शुरू करते पर दो-तीन पंक्तियों के बाद जहां अटक जाते कि अम्मा छोटे बच्चों के समान अंगूठा दिखा- दिखा बोलतीं -"टिलिलिलिली"। दादा कहते-"शरण जी तुम्हारी अम्मा जीत गई।" शरण भाई हतोत्साहित न हों, इस गरज से अम्मा उनको शाबासी देती और दो बार पुन: उन्हीं पंक्तियों को पढ़ने को कहतीं। शरण भाई के लिए यह नई चुनौती होती। वह कहते- "नहीं अम्मा, सिर्फ एक बार देखूंगा।" उसके बाद एक प्रवाह में वह भी उन पंक्तियों को दोहरा देते। मैं ताली बजाकर उनकी उपलब्घि का मजा लेती। अम्मा के आचार-विचार उनकी अपनी मान्यताएं, उनके संस्कार जो कुछ थे, वह सब नितांत उनके ही थे। जब हम बहिनें कुछ समझदार हो गई थीं, अम्मा अपने विवाह का संक्षिप्त विवरण बतातीं। पता नहीं कायस्थों में या उत्तरप्रदेश की प्रत्येक जाति में या फिर हमारे ही खानदार में एक विशेष परंपरा थी- सप्तपदी से पूर्व घर की धोबिन से सुहाग मांगना। बारात का आगमन हो चुका था। जनवासे से अम्मा के लिए वरी का जोड़ा आया। उस समय धोबिन दरवाजे पर हाजिर थी। पीले सिंदूर से उसने अपनी मांग भर रखी थी अम्मा को नानी का आदेश मिला कि अम्मा धोबिन से सुहाग लेने बाहर आएं। धोबिन वधू के सिर पर अपना सिर इस प्रकार धरती और रगड़ती कि उसका सिंदूर वधू की मांग व बालों में भर जाए। अम्मा ने बगावत कर दी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में ऎलान कर दिया कि उन्हें यह दस्तूर मान्य नहीं है। नानी तथा अन्य जो महिला संबंधी उपस्थित रही होंगी, सब अप्रसन्न हुई, नाराजगी भी दिखाई पर अम्मा अपने निर्णय से टस-से-मस नहीं हुई। अम्मा कहतीं कि कितनी शर्मनाक प्रथा थी यह।
इस अवसर पर एक अन्य रीत और निभाने की अम्मा से अपेक्षा की गई थी। विवाह से पूर्व रात्रिकालीन भोजन के बाद अम्मा को सुपारी की आधी डली दे दी गई, इस आदेश के साथ कि वह डली को केवल चूसती रहें। जब नौश जी दरवाजे पर आएंगे, उनकी आरती उतारने के बाद जो पान का बीड़ा उन्हें नजर किया जाएगा, उसमें अम्मी की चूसी हुई सुपारी की डली को काटकर रखा जाएगा। अम्मा को यह बात समझा दी गई थी। अम्मा ने उस समय कोई कुतर्क नहीं किया और सुपारी मुंह में डाल ली। मन में ही उन्होंने निश्चय कर लिया था, किस कदर घिनौनी रीत है, उसे तोड़ना होगा। दूसरे दिन भोर होते ही उनसे वह डली मांगी गई। उन्होंने स्वाभाविक हंसी के साथ कह दिया-"अरे, मैं तो भूल से सारी चबा गई। खा लिया।" उनकी इस भूल का निवारण करने हेतु किसी ने सुझाव दिया कि अभी भी क्या बिगाड़ा है। एक नई डली रखकर कुछ समय के लिए चुसा दी जाए। अम्मा को यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं था। हारकर उन्होंने नानी को बता दिया-"ऎसा घिनौना काम मैं नहीं करूंगी।" अम्मा के इस विरोध के प्रति नाना ने अपनी सहमित जताई। अम्मा प्रसन्न! इस परिवेश में अम्मा जब ससुराल पहुंची, पांव में वजनदार चांदी पहनने से उनके पांव में सूजन आ गई। दो दिन बाद असह्य लगने पर अम्मा ने अपनी सास अर्थात् हमारी दादी के सामने विनम्रता से अपने पांव पेश किए। दादी बड़ी तेजतर्रार महिला थीं। अनिच्छा से ही सही, किंतु उन्होंने सब भारी चीज उतारकर केवल दो-दो लच्छे पहने रहने की अनुमति दे दी। इस अनुमति के पीछे यह कारण भी हो सकता है कि वह अपने बेटे के स्वभाव से भली-भांति परिचित थीं। यदि दादी खुद अम्मा को राहत न देतीं तो निश्चित ही दादा यह फर्ज अदा कर अम्मा को इस कष्ट से मुक्ति दिला देते। इस महती कार्य का सेहरा दादी के सिर बंधा। हमारी दादी कितनी दूरदर्शी रही होंगी।
अब किस्सा सुनो, चार तोले की विशालकाय नथ का। नाक का छोटा-सा छेद उतना वजन झेल सके उसकी व्यवस्था एक डोरी से बांधकर की जाती। डोरी का एक सिरा नथ पकड़ता और दूसरा सिरा कानों पर पिरोया जाता। खाना खाते समय कान के ऊपर की डोरी खोलकर नथ को सिर से चढ़ाकर गले में फंसाकर मुंह में ग्रास डालने के लिए पर्याप्त सुविधा दिलाई जाती थी। एक सप्ताह के अअंदर इस नथ ने अम्मा को जो यातना दी, वह उनके मुंह से सुनने लायक थी। (टीटू आज हाथ काफी कांप रहे हैं, अक्षरों की आड़ी-टेढ़ी बनावट देख रही हो, ना?) हमारी दो बुआएं थीं। बड़ी का नाम था चंद्रावती, छोटी थीं सूर्यवती। बड़ी बुआ को अपनी नाक की सूजन और लाली अम्मा ने दिखाकर कहा कि इसको उतारने की सिफारिश दादी से वे ही करें। दादी स्वयं अम्मा के पास आई। "दुलहिन, जरा अपनी नाक तो दिखाओ। नाक दिखाते अम्मा रो पड़ी। दादी पसीज उठीं। उन्होंने अपने हाथ से वह नथ खोलकर मूंग के बराबर की सोने की लौंग पहना दी। शादी से पहले भी अम्मा इसी लौंग को पहना करती थीं।" दादी जैसे कठोर स्वभाव की थीं, उनका आज विश्लेषण करूं तो यह समझ में आता है कि उन्हें यह एहसास था कि अम्मा शिक्षित हैं। अत: उनके आगे झुकना ही होगा। इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने अपनी नई-नवेली बहू की नथ स्वयं उतारी होगी। उस नथ को जिस पिटारी में रखा जाता था, वह आज भी मेरे पास कहीं सुरक्षित मिलेगी। कुछ वर्षो बाद उसी नथ से अम्मा ने सोने की चार चूडियां इलाहाबाद आकर नानी के सुनार से बनवाई थीं। यह भी दादी की मृत्यु के पश्चात् कि कहीं उन्हें ठेस न पहुंचे।
जब सुनार अम्मा को चूडियों के नमूने दिखा रहा था। हम, यानी दीदी और मैं भी उनके पास खड़े हुए थे। मैंने दबी जबान कहा- "अम्मा, हम लोगों के लिए भी दो-दो चूडियां बनवा दीजिए।" अम्मा ने नानी की ओर देखा। नानी ने हम बहिनों को क्या जोर से झिड़का- "दुर्र, दुर्र! बिटियन की जात, का सोने की चूडियां पहिनीं?" हम भाग छूटे। उन दिनों सोना 22 रूपए तोला हुआ करता था। आज यहीं बस कर रही हूं। टीटू जाने क्यों काफी कमजोरी महसूस हो रही है। लेटना है।
मौसी
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