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Saturday, 19 May, 2012
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थोड़ा, प्रैक्टिल हो जाओ प्रतीक
Sunday, February 05, 2012, 11:02 hrs IST
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प्रतीक बब्बर महज 14 दिन के थे, जब उनकी मम्मी स्मिता पाटिल उन्हें अपनी मां विद्याताई पाटिल की बाहों में थमाकर हॉस्पिटल गई थीं, कभी वापस ना आने के लिए ...। उस दिन से यानी 13 दिसम्बर 1986 से विद्याताई प्रतीक के जीवन में खाली हुई उस जगह को भरने की लगातार कोशिश कर रही हैं। उसे मां की तरह प्यार दे रही हैं, साथ ही अपने नाती में अपनी बेटी का अक्स देखती हैं। वह कहती हैं, "बेशक मैं उस खालीपन को नहीं भर सकती, जो प्रतीक की मां के ना होने से उसकी जिंदगी में आया है, लेकिन हमेशा अपना सौ प्रतिशत देने की कोशिश करती हूं मैं...।"
कैसा रिश्ता है नानी और नाती के बीच इसका अंदाजा सहज

ही हो जाता है, जब 80 साल की विद्याताई पाटिल को प्रतीक "मां" कहते हैं... इस साल प्रतीक की दो फिल्म एक दीवाना था और इश्क रिलीज होंगी।

कोई ये कैसे बताए...
विद्याताई ने कभी इस बात की पब्लिसिटी नहीं करनी चाही कि प्रतीक नामचीन अदाकारा स्मिता पाटिल का बेटा है। फिर बात चाहे स्कूल की हो या कहीं और की। वह बताती हैं,"आज की जनरेशन तो जानती तक नहीं कि स्मिता पाटिल कौन थी? और हमें छत पर खड़े होकर सबको सुनाना पसंद नहीं है...। हम सिम्पल लोग हैं।" प्रतीक कहते हैं,"स्कूल में जब कोई मुझसे मेरे पैरेन्ट्स के बारे में पूछता, तभी मैं उनके बारे में बात करता। (स्वर्गीय स्मिता पाटिल ने अभिनेता राज बब्बर से विवाह किया था) विद्याताई बताती हैं, "पढ़ाई में प्रतीक का बिलकुल ध्यान नहीं था। किसी तरह हायर सैकेन्ड्री तक इसको जबरदस्ती पढ़ाया। इसके बाद मैं चिंतामुक्त हुई।"

तू नहीं तो जिंदगी में और क्या...
प्रतीक की परवरिश ने विद्याताई को अपने दुख से उबरने में बहुत सहारा दिया। वह कहती हैं,"सब भगवान की इच्छा से होता है। फिर भी प्रतीक को खोने का अंजाना-सा डर हर समय मुझ पर हावी रहता। मुझे लगता कि कोई प्रतीक को मुझसे छीनकर ले जाएगा। इसलिए मैं कभी उसे अपनी नकारों से दूर नहीं जाने देती थी। हर बच्चे की तरह यह भी बहुत शरारत किया करता। कभी कबर्ड में छिप जाता, तो कभी बाथरूम में और मुझसे कहता, अब आप मुझे ढूंढ़ो। किचन में काम करते समय भी मैं इसे अपने साथ ही रखती और यह रोटी बनाने की जिद करता... तो मैंने इसे एक चकला-बेलन लाकर दे दिया। इसकी शरारतें देखकर मेरे आसूं छलक आते। मैं सोचती काश, आज स्मिता इसकी शरारतों को देखने के लिए होती। आठ साल की उम्र में प्रतीक को क्रिकेट खेलने का शौक लगा और मैं घर में ही इसके साथ क्रिकेट खेला करती। जब कभी इसके नानाजी (पॉलिटीशिन शिवाजी राव पाटिल) विदेश जाते, यह उनसे बैट लाने के लिए कहता। इस तरह इसके पास दर्जनों बैट इकट्ठा हो गए। बचपन से ही इसकी आदत है कि यह किसी भी चीज से बहुत जल्दी बोर हो जाता है। मैं इसे दिनभर में तकरीबन 12 अलग-अलग क्लासेज में भेजा करती। लेकिन यह किसी एक क्लास में भी ठीक से नहीं टिकता। हर समय चिडिया की तरह चहकता रहता। पढ़ाई में इसका बिलकुल ध्यान नहीं था, बस गेम्स में ही ध्यान रहता।" यह सब सुनकर प्रतीक शर्म से लाल हो जाते हैं और कहते हैं, "गेम्स में मेरा बहुत इंटे्रस्ट था। स्कूल कैम्पस में होने वाले सभी खेलों में मैं भाग लेता।"

झुकी-झुकी सी नजर...
प्रतीक कहते हैं, "मां हर समय मुझे समझाती रहती हैं, कड़ी मेहनत करो, समय पर खाना खाओ, स्मोकिंग बंद कर दो, गाड़ी धीरे चलाया करो और प्रेक्टिकल बनो...इस पर विद्याताई कहती हैं, अगर इससे कोई प्यार से बात कर ले, तो यह उसके लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। यह लड़का कुछ नहीं समझता, इतने सीधेपन से काम चलता है क्या!" वह एक घटना का जिक्र करती हैं, "एक दिन यह काफी सारे कपड़े लेकर घर आया और बिल के बारे में पूछने पर कहने लगा, ये कपड़े मुझे मेरे फ्रैंड ने गिफ्ट किए हैं। उसकी कपड़ों की दुकान है। तब मैंने इसे समझाया कि कोई भी नुकसान उठाने के लिए दुकान नहीं चलाता। एक साल बाद लम्बा-चौड़ा बिल घर आ गया और मेरे पास कोई रास्ता नहीं था सिवाय उसे चुकाने के।

दिल-ए-नादान...
प्रतीक की मां यानी विद्याताई उसका एक और सीक्रेट उजागर करती हैं और वह है लड़कियों को लेकर प्रतीक की शर्म। वह बताती हैं "अधिकतर लड़के लड़कियों को अपने आस-पास देखकर खुश होते हैं, लेकिन जब लड़कियां इसके साथ खेलने आया करतीं, तो उन्हें देखकर यह बाथरूम में छिप जाया करता।" इतना सुनते ही प्रतीक बोल पड़ते हैं, "मुझे आज भी लड़कियों से शर्म आती है। बहुत अजीब अहसास होता है, जब गल्र्स की अटेंशन मुझे मिलती है। हाल ही की बात बताता हूं, एक फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में मैं अपनी टीम के साथ गया हुआ था। तभी एक लड़की मेरे पास आई, वह जानना चाहती थी कि क्या मैं सिंगल हूं वह बिना किसी झिझक के सीधे बोली, क्या आपको गर्लफ्रेंड की जरूरत है...और मैं समझ नहीं पाया कि कैसे रिएक्ट करूं ।"

आखिर क्यों...
कोई सोच नहीं सकता था कि प्रतीक बड़ा होकर एçक्ंटग करेगा। उसे क्रिकेट का कीड़ा था। सब सोचते कि स्पोट्र्स में ही इसका कॅरियर बनेगा। वह बताते हैं,"कॉलेज तक मैंने क्रिकेट कोचिंग को सीरियसली लिया, लेकिन इसके बाद दोस्तों के साथ आउटिंग पर जाना बहुत ज्यादा होने लगा। ऎसे में क्रिकेट कहीं पीछे छूट गया।" नानी चाहती थीं कि प्रतीक सुभाष्ा घई का एçक्ंटग स्कूल जॉइन करे। लेकिन प्रतीक को तो दो महीने में एक दिन ही क्लास अटेंड करना पसंद था... इस पर नानी कहती हैं,"इसकी मां एक उम्दा अभिनेत्री थी और मैं चाहती थी कि यह भी उसी के पदचिन्हों पर चले। ...पर यह एक जगह टिककर बैठ ही नहीं पाता। मैं समझ ही नहीं पाती थी कि आखिर इसके साथ क्या करूं। एक बार मैंने इसे एड गुरू के नाम से पहचाने जाने वाले प्रहलाद कक्कड़ के पास भेजा। प्रहलाद और स्मिता बहुत अच्छे दोस्त थे। जब यह प्रहलाद के ऑफिस से लौटा, तो मैं इसे देखकर एकदम घबरा गई, क्योंकि इसकी आंखों में आंसू थे। इसने बताया कि प्रहलाद ने सभी के सामने इससे बाथरूम साफ करने को कहा। इसने बाथरूम तो साफ कर दिया, पर बहुत डिस्टर्ब हो गया। तब मैंने इसे समझाया कि काम सिर्फ काम होता है, कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। अब्बास टायरवाला की वाइफ पाखी ने प्रतीक को फिल्म जाने तू या जाने ना के लिए सलेक्ट किया, तो यह बोला,"मां मैं शूटिंग के लिए अलीबाग जा रहा हूं। फिल्म जाने तू या जाने ना में मेरा सलेक्शन हो गया है। यह आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म है। सच कहूं, तो उस समय तक मुझे यह नहीं पता था कि आमिर खान हैं कौन। फिर प्रतीक ने मुझे बताया। दरअसल मैं फिल्म नहीं देखती, हमारा पूरा सर्किल पॉलिटिक्स से जुड़े लोगों के इर्द-गिर्द रहता है। केवल स्मिता ही इंडस्ट्री से जुड़ी थी। मैं कभी उसके साथ सेट पर नहीं गई, ना ही कभी प्रतीक के साथ...।

दिखाई दिए यूं...
जाने तू या जाने ना साइन करने तक प्रतीक केवल मस्ती में ही मशगूल रहता था। फिल्म रिलीज के बाद जो रेस्पॉन्स मिला, उसने ही इसे एçक्ंटग के बारे में गम्भीरता से सोचने पर मजबूर किया। वह बताते हैं,"मुझे लगा कि मुझे कुछेक डायलॉग ही तो मिले, जिन्हें मैंने बोल दिया। तब तक मुझे इस बात का कोई आइडिया नहीं था कि लीड रोल का मतलब क्या होता है... बड़े बैनर के साथ काम करने का मतलब क्या होता है...और जब मुझे इस सबका ज्ञान हुआ, तब लगा कि यह सब एक स्विमिंग पूल की तरह है और मैं जितना चाहूं उतना तैर सकता हूं।" विद्याताई वह दिन नहीं भूलतीं, जब उन्होंने प्रतीक को पहली बार ऑन स्क्रीन देखा "जाने तू या जाने ना के प्रीमियर में पहली बार प्रतीक को ऑन स्क्रीन पर देखा, मैं बहुत ही खुश थी। हर पल मुझे स्मिता की याद आ रही थी, लगा मेरी सारी चिंताएं दूर हो गई। स्मिता के साथ भी यही हुआ था। श्याम बेनेगल ने उसकी प्रतिभा को पहचाना और उसके बाद हमने। अब प्रतीक के लिए यही काम पाखी ने किया। उस पर विश्वास किया कि वह एçक्ंटग कर सकता है। यह उसका भाग्य ही है कि वह एक्टर बन सका। अपनी मां की तरह प्रतीक भी एकदम नैचुरल है। यह प्रतीक की किस्मत है कि उसे अच्छे डायरेक्टर्स का साथ मिला। अब जरूरत है कि वह कड़ी मेहनत करे।"

करोगे याद तो...
विद्या ताई बताती हैं, "प्रतीक में सादगी वंशानुगत है। अपनी मां की ही तरह यह भी बहुत सीधा-सादा है।" इस पर प्रतीक बोल पड़ते हैं, "मुझे कहा जाता है कि मॉम ने जो कुछ भी किया, वह सारे फैसले दिल से लेती थीं। मैं तो नहीं जानता ना कि वह क्या करती थीं और क्या नहीं। मैं क्या करूं अगर मां की आदतें मुझे कुदरती तौर पर मिली हैं।" नानी मां प्रतीक को कभी स्मिता पाटिल की फिल्म नहीं दिखाती थीं। वह कहती हैं, "स्मिता की फिल्म देखते समय अक्सर मेरे आसूं निकल आते, जो प्रतीक को बिलकुल पसंद नहीं और वह वहां से उठकर चला जाता। इसलिए मैं कभी इससे नहीं कहती कि ये अपनी मां की फिल्म देखे।" प्रतीक की व्यक्तिगत दुनिया अपनी नानी मां के इर्द-गिर्द घूमती है। वह कहते हैं, "मैंने मां को कह दिया है कि उन्हें मेरे बूढ़ा होने तक जिंदा रहना होगा। अगर उन्होंने ऎसा नहीं किया, तो मैं ना तो काम करूंगा, ना ही शादी करूंगा। मेरी खुशियां इनमें ही समाई हैं। अगर मैं इन्हें नहीं देखता...इनकी आवाज मेरे कानों में नहीं पड़ती...तो मैं बेचैन हो जाता हूं।"अपनी बात कहते हुए प्रतीक भावुक हो जाते हैं और विद्याताई के भी आंसू नहीं थमते। प्रतीक को सम्भालते हुए वह कहती हैं, "एकदम पागल है यह लड़का। मैं चाहती हूं कि मेरे जीते-जी यह नाम कमा ले। इसकी अपनी पहचान हो और यह कामयाब इंसान बन जाए। ताकि मुझे इस बात का सुकून रहे कि मैंने इसे एक अच्छी परवरिश दी है। मैं जानती हूं कि एक दिन ये मेरा सपना जरूर सच करेगा।
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