केन्द्र के बजट ने आम आदमी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं और महंगाई से उसका जीना मुहाल कर दिया। अकाल और पानी की कमी की मार झेल रहे राजस्थान के वाशिंदों को अब प्रदेश के बजट से आस है। बेरोजगारों को रोजगार की आस है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की दाम घटाने की ना के बाद आमजन को पेट्रोल और डीजल पर राज्य कर के घटने की उम्मीद है।
वैसे जब कांग्र्रेस राज्य में विपक्ष में थी और केन्द्र ने पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिए थे, तब सोनिया गांधी ने राज्यों को अपने हिस्से की कर राशि में कटौती करके जनता को राहत देने की प्रदेश की कांग्र्रेस सरकारों को हिदायत दी थी। दिल्ली, महाराष्ट्र आदि राज्यों में इसकी पालना भी हुई थी। राज्य में उस समय कांग्र्रेस विपक्ष में थी और भाजपा सत्ता में। भाजपा ने दाम नहीं घटाए थे और कांग्र्रेस ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। अब ठीक वैसे ही हालात राज्य की कांग्र्रेस सरकार के सामने हैं। जनता डेढ़-दो साल पहले का वो समय भी याद कर रही है और टकटकी लगाकर जल्द आने वाले राज्य बजट को देख रही है। भाजपा भी इसी का इंतजार कर रही है। यदि सरकार ने दाम नहीं घटाए तो प्रदेशभर में आंदोलन को तेज करने का ऎलान किया जाए, ताकि संगठन में फिर जान फूंकी जा सके। हालांकि भाजपा ने दबाव की रणनीति के तहत अगले एक सप्ताह तक धरने-प्रदर्शन की घोषणा कर दी है। इस महंगाई ने त्राहि-त्राहि मचा दी। सब्जी, आटा, दाल समेत रोजमर्रा की सभी चीजों को आम व्यक्ति की पहुंच से दूर कर दिया। अब तो कांदा-रोटी खाने का दौर भी नहीं रहा। गुड़-रोटी भी मजदूर के हाथ से छिन गई। एक चाय का प्याला मजदूर के लिए टॉनिक का काम करता था। महंगी चीनी नेे उसका यह टॉनिक भी छीन लिया। फल तो मध्यमवर्गीय परिवारों के फ्रिज से गायब से हो गए। किसी घर में कोई बीमार पड़ जाए तो उसके लिए फल लाने की एवज में दूसरे सदस्यों की कई जरूरतों को मारना पड़ता है। नौकरी की उम्मीद में नौजवान अपने हुनर को खत्म कर रहा है।
हर चुनावी घोषणा पत्र में राजनीतिक पार्टियां हर साल हजारों लोगों को नौकरी देने का वादा करती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद सब गायब हो जाता है। यह कोई नई बात नहीं है, सालों-साल से राजनीतिक पार्टियां यही सपना दिखाकर बेरोजगारों को छल रही हैं। गहलोत सरकार के इस बार के बजट से बेरोजगारों को कुछ रोशनी की किरण दिखाई दे रही है। केन्द्र ने सर्व शिक्षा अभियान का बजट बड़ा कर राज्य के शैक्षणिक क्षेत्र में नौकरियों का रास्ता खोला है। देखना यह है कि चालू बजट में नौकरियों की कितनी घोषणाएं पूरी की गई? यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है, परंतु नौजवान की बेरोजगारी रूपी बीमारी का अब इलाज जरूरी है। ज्यों-ज्यों प्रदेश में बेरोजगारों की फौज खड़ी होती जाएगी और रोजगार नहीं मिलेगा तो हालात काबू से बाहर हो सकते हैं। कहीं यहां भी ऎसी मांग न उठ जाए कि राजस्थान में सिर्फ राजस्थानी को अवसर दिए जाएं। बेरोजगारी भत्ता कितने बेरोजगारों को मिल रहा है और सरकार ने इस पेटे कितने रूपये का भुगतान किया है? यह एक आंकड़ा ही सचाई को बयां करने के लिए काफी है। सरकार के पास भी कोई जादुई चिराग नहीं है कि जिसे घिसा और राज्य से बेरोजगारी गायब हो जाए। बेरोजगारी बड़ी बीमारी हो चुकी। जिस गति से प्रतिभाएं आगे आ रही हैं, उस मुकाबले रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। वैसे ही मंदी ने देश में लाखों लोगों के रोजगार छीन लिए। हालात को देखते हुए नौजवानों को समझौता करना पड़ेगा। उन्हें सरकारी नौकरियों की तरफ ही ताकना छोड़ना पड़ेगा। अपनी योग्यता और प्रतिभाओं को निजी क्षेत्र के साथ-साथ स्वयं के व्यवसाय में लगाना होगा। कहते हैं ना, इंसान चाहे तो उसकी मुराद पूरी होने से कोई नहीं रोक नहीं सकता है। जब हर नौजवान जानता है कि वह आईएएस, आईपीएस, आरएएस, आरपीएस नहीं बन सकता है, तो फिर उसे अपनी काबलियत के हिसाब से प्रयास करके कोई भी रोजगार हासिल करना चाहिए।
काम कोई छोटा-या बड़ा नहीं होता है। यह भ्रम तोड़ना होगा कि सरकारी नौकरी में स्थायित्व है। निजी क्षेत्र में काबलियत के हिसाब से पैसा है। जितने इनक्रीमेंट और प्रमोशन निजी क्षेत्र में हैं, उसकी तो सरकारी नौकरी में कल्पना भी नहीं की जा सकती है। फिर इस बजट में क्यों इतनी उम्मीद की जा रही है? सरकार नौकरियों के लिए अवसर उपलब्ध करवाने के लिए कृत संकल्प है, परंतु आस सिर्फ इसी की क्यों? यह एक गंभीर विषय है, जिसके बारे में न सिर्फ सोचना पड़ेगा, बल्कि धारणा को भी बदलना होगा। सरकारी नौकरी का अवसर मिलता है तो ठीक है, वरना अपनी राह तो है ही। जिस गति से आबादी बढ़ रही है, उस गति से किसी भी सरकार के लिए नौकरियां उपलब्ध करवाना बूते से बाहर है। संसाधन सीमित हैं और राजनीतिक कारणों से सरकारों की मजूबरियां हैं कि न तो नए कर लगा सकती न ही पुराने करों में ज्यादा बढ़ोतरी करके बोझ लाद सकती है। राज्य में पीने के पानी का संकट है, ऎसे में उद्योगों से क्या आस लगाई जा सकती है? राज्य की जल नीति में भी उद्योगों को वरीयता सूची में अंतिम पायदान पर रखा गया है। बिजली में भी उद्योगों को ही सबसे ज्यादा कटौती का सामना करना पड़ रहा है।
सरकार उद्योगपतियों के निवेश के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है, लेकिन आधारभूत ढांचे के अभाव में निवेश करने की कौन गलती करेगा? सरकार इस ढांचे को मजबूत करने का ठोस प्रयास करे तो काफी हद तक समस्याएं खुद-ब-खुद ही दूर हो सकती हैं। नौकरियों की आस लगाए लोग सरकार की तरफ देखेंगे भी नहीं। राज्य अपने तरक्की के पथ पर बढ़ जाएगा। राज्य के जो हालात सामने हैं, उसके बारे में सोचना होगा। प्रदेश का ज्यादातर हिस्सा अकाल की चपेट में है। पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। खेतों में फसल के नाम पर कुछ नहीं बचा। पशुओं के लिए चारा नहीं है। रेल से पानी पहंुचाया जा रहा है। सात-सात दिन में भी लोगों को पीने का पानी वितरित नहीं किया जा रहा है। बजट तो छोडें, अभी तो सरकार के लिए गर्मियां काटना भी मुश्किल है। राज्य में पानी को लेकर आग लग चुकी है। चारों ओर मची त्राहि-त्राहि से निपटना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है। इस बजट में सबसे ज्यादा पीने का पानी की समुचित व्यवस्था करना अहम होने की संभावना है। पशुधन राज्य की बड़ी ताकत है। उसे बचाना भी कोई कम काम नहीं है। विपक्ष इन्हीं को ताक रहा है, ताकि राजनीतिक रोटियां सेंकी जा सकें। यही राजनीति भी रह गई है। राज्य हित से ज्यादा महत्वपूर्ण स्वहित हो चुके हैं। अकाल के हालात के चलते महानरेगा रोजगार का बड़ा साधन बना है।
लोकतांत्रिक सरकार के इस प्रयास की सराहना करने से कोई नहीं चूकता, लेकिन सरकार के पास अभी ऎसा कोई हथियार नहीं लगा, जिससे महानरेगा के भ्रष्टाचार को खत्म करके वास्तव में काम कराए जा सके और लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध हों। केन्द्र से अथाह धन इस मद में आ रहा है। सरकार को ऎसे किसी फॉर्मूले का क्रियान्वयन करना होगा, जिससे पूरे पैसे का सही उपयोग हो। वरना स्वर्गीय राजीव गांधी की कही बात, केन्द्र के एक रूपये में से 20 पैसे ही गरीब को मिल पाता है, चरितार्थ होगी।
बहरहाल, राज्य को विकास के शिखर पर पहुंचाने के लिए बजट को इस तरह से तैयार करना होगा कि उपलब्ध साधनों का अनुकूलतम उपयोग किया जा सके। हर हाथ को काम मिले। किसान के घर में भी वैसे ही बिजली मिले, जैसी शहरों की कोठियों में मिलती है। लोगों को प्यास बुझाने के लिए शुद्ध पेयजल मिले। कल-कारखानों को बढ़ावा देने के लिए खुली सोच के साथ प्रयास जरूरी हैं। बजट ही सरकार का आईना है और सरकार की दिशा को इंगित करता है। तभी तो बजट से पहले हर वर्ग कयास लगाना शुरू कर देता है। अपनी जेब को संभालना शुरू कर देता है। इसी आस के साथ कि इस बार तो बजट अपना होगा।
उरूक्रम शर्मा
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