एक विशाल जंगल था। एक बार अकाल पड़ने पर राजा गजराज सभी हाथियों को लेकर पास के दूसरे जंगल में चला गया, जहां एक विशाल तालाब था। उस जंगल में भारी तादाद में खरगोश रहते थे। हाथियों की आवाजाही बढ़ने से खरगोश मारे जा रहे थे। एक होशियार बूढ़े खरगोश ने इस समस्या से निजात पाने का निश्चय किया और वह गजराज से मिलने अकेले ही निकल पड़ा। रास्ते में उसे गजराज मिल गया। बूढ़े खरगोश ने उससे कहा- "मुझे चन्द्रदेव ने तुम्हारे पास मिलने भेजा है। वे खरगोशों के मारे जाने से बहुत नाराज हैं।
यह सुनकर गजराज घबरा गया तभी बूढ़ा खरगोश बोल उठा- "चन्द्र देव अभी तालाब में हैं और भारी गुस्से में हैं। तुम मेरे साथ चलो और चन्द्र देव के दर्शन कर लौट आना।" बूढ़ा खरगोश आगे-आगे चल पड़ा और राजा गजराज उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। कुछ देर बाद दोनों तालाब के किनारे पहुंच गए। उसने गजराज को चंद्रमा की परछाई दिखाई और जब लहरों में परछाई हिल रही थी तो उसे दिखाकर खरगोश ने राजा गजराज से कहा- "देखो चन्द्र देव गुस्से से कांप रहे हैं। गजराज ने तत्काल परछाई को प्रणाम किया और बोला-"चन्द्र देव क्षमा करें अब कोई ऎसी गलती नहीं करूंगा।" हाथियों का राजा गजराज तुरंत ही वहां से भाग खड़ा हुआ और अपने साथी हाथियों को भी अपने साथ अन्यत्र स्थान पर ले गया। अत: संकट आने पर सदैव बुद्धि से काम लेना चाहिए। बुद्धि का उपयोग कर बड़े से बड़े शक्तिशाली को भी पराजित किया जा सकता है
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