एक वन में दो वृक्ष सन्निकट थे। एक सरल-सीधा चंदन का वृक्ष था। दूसरा टेढ़ा-मेढ़ा पलाश का वृक्ष था। दोनों सखा थे। एक बार लकड़हारे वन में घुस आए। चंदन सहम गया। पलाश बोला- "सीधे वृक्ष को काट दिया जाता है। सरलता से तुम्हारे ऊपर संकट आ गया।" लकड़हारों ने चंदन को काट लिया और लकड़ी बेच दी। प्रतिमा बनाने वाले ने उसकी बांके बिहारी की मूर्ति बनाकर बेच दी। मूर्ति प्रतिष्ठा के अवसर पर यज्ञ-हवन का आयोजन रखा गया। यज्ञीय समिधा (लकड़ी) की आवश्यकता थी। लकड़हारे उसी वन में गए और पलाश को काट दिया। उसके छोटे-छोटे टुकड़े होकर यज्ञशाला में पहुंचे।
समिधा को पहचान कर मूर्ति बन चंदन बोला- "आओ मित्र! ईश्वर की इच्छा बड़ी बलवान है। फिर से तुम्हारा हमारा मिलन हो गया।" पलाश बोला - "देखो, यज्ञ मंडप में यज्ञाग्नि जल रही है। लगता है कुछ ही पल में राख हो जाऊंगा। अब नहीं मिल सकेंगे।" चंदन ने कहा - "भाई मैं सरल व सीधा था मुझे परमात्मा ने अपना आवास बनाकर धन्य कर दिया। तुम्हारे लिए भी मैंने भगवान से प्रार्थना की थी। अत: यज्ञीय कार्य में देह त्याग रहे हो। अन्यथा दावानल में जल मरते। सरलता भगवान को प्रिय है। अगला जन्म मिले, तो सरलता मत छोड़ना। सज्जन कठिनता में भी सरलता नहीं छोड़ते, जबकि दुष्ट सरलता में भी कठोर हो जाते हैं। सरलता में तनाव नहीं रहता। तनाव से बचने का एक मात्र उपाय सरलता पूर्ण जीवन है।" पलाश का मुख एक आध्यात्मिक दीप्ति से चमक उठा।
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