वर्षो से सत्संग में जाते हुए भी, संध्या उपासना करते हुए भी, मन में हताशा, निराशा के विचार उभरते हैं। कभी धन कमाने की योजनाओं के विचार, तो कभी किसी से बदला लेने की भावनाएं उठ खड़ी होती हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि मन जो अत्यंत गतिशील है, उसको स्थिर और वश में कैसे किया जाए। तात्पर्य यह नहीं कि यह गतिहीन हो जाए। यह गतिहीन हो ही नहीं सकता। जिस प्रकार अग्नि का धर्म उष्णता है, उसी प्रकार चंचलता मन का धर्म है। जब हम मन को वश में करने की बात कहते हैं, तो हमारा तात्पर्य बहिर्मुखी मन, बाहरी विषयों की ओर दौड़ने वाले और विषय वासनाओं में लीन होने वाले मन से होता है, जिसके लिए हम चाहते हैं कि वह अंतर्मुखी हो जाए।
मानव की सब इंद्रियां स्वभावत: बहिर्मुखी हैं और सदा बाहरी विषय - वासनाओं को ग्रहण करती हैं। इस अवस्था में हमारे मन की आंतरिक शक्तियां इतनी फैलती हैं कि वे बाह्य जगत के संस्कारों को ग्रहण करती हैं। आत्मज्ञान के लिए मन, बुद्धि और इंद्रियों को अंतर्मुख करना अत्यंत आवश्यक है। इसको अंतवृüत्ति कह सकते हैं अर्थात मन का अपने आप में लय हो जाना। मन को उपासना और शुभ कर्मो में लगाने में ही कल्याण है। मन की पवित्रता जरूरी है। मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है। अत: मन को जीतने का प्रयास करना चाहिए। मन को वश में करने के लिए निरंतर शुभ विचारों का संकल्प करना चाहिए।
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